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 हायकू



*अंकुर सहाय 'अंकुर'

 

थकती हुई 

विचरण करती

थी एक आशा ।

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उसने कहा

"आप तो ऐसे न थे"

मैं हतप्रभ ।

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दुनिया माने

नज़र से गिरा है

आदमी नहीं ।

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संकट काल

फैला कोरोना जाल 

हाल  बेहाल ।

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हम भी चुप

अब कैसे हों बातें

तुम भी चुप ।

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वक्त के साथ

थामना तो चाहा था

तुम्हारा हाथ ।

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किसने माना

रेत की दीवार सा

 है ढह जाना ।

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पेट है खाली

पीटने वाले पीटें

वक्त की थाली ।

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गली न दाल

बदलते ही रहे

अपनी चाल ।

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बना ही डाले

चिड़ियों ने घोसले

क्या करे आंधी ।

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गांधी के राम

आज हो गए आम

किस्सा तमाम ।

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हे मेरे राम !

जीवन की है शाम

नहीं आराम ।

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सबने देखा

बंधी हुई मुट्ठी में

बन्धक रेखा ।

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नयी सुबह

तू चुप मत रह 

अपनी कह ।

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बोते हैं आंसू

काटते हैं मुस्कान

नई उम्मीद ।

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आओ रच लें

एक नई गीतिका

प्यारी वीथिका ।

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ठंड में पड़ा 

देश का सच्चा भक्त 

गर्म है रक्त ।

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कौन हो तुम ?

सुधर नहीं सके ?

कुत्ते की दुम !

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भीगी बिल्ली सा

पर बनना चाहूं 

शेखचिल्ली सा ।

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एक कहानी

पीड़ा को पहचानी 

मीरा दीवानी ।

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जल ही जल

डूब गई फसल

क्या होगा कल !

*आजमगढ़, उ.प्र.

 


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