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मानवता का ढ़ोग



*रश्मि वत्स
लॉकडाउन में हमारी कालोनी वालों के मन में भी मानवता जाग्रत हुई और सभी के सहयोग से गरीबों के लिए भोजन तैयार किया गया ।अब बारी थी उसे वितरित करने की तो पॉच,महिलाओं और पॉच पुरुषों ने इस कार्य के लिए स्वेच्छा से हामी भरी ।उनमे मैं भी शामिल थी और फिर शुरू हुआ भोजन वितरण का कार्य ।

जहाँ भी हमें असहाय लाचार दिखे हम उन्हें अपनी सेवा देते गए । तभी मेरी नज़र सड़क किनारे बैठे बूढ़े असहाय दम्पत्ति पर पड़ी तो मैं दो पैकिट लेकर उनके पास पहुंची । उन्हें ऐसी दयनीय स्थिति में देख मन बहुत विचलत हो गया। खैर अपनी भावनाओं को वश कर मैंने वह.पैकेट उन्हें थमा दिया।

उन दोनों ने मुझे आशिर्वाद दिया और बोले "बेटा एक पैकेट और दे दो। "

"मैंने कहा एक और??"

तो वो बोले "हमारा पोता भी है साथ पानी लेने गया है।"

जैसे ही एक पैकेट लेने मैं  वापिस मुड़ी ,तकरीबन दस-बारह वर्ष का बालक तपाक से बोला "आंटी फोटो ले ली आपने ।"

मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा और पूछा "फोटो क्यों ?"

तो बड़ी ही मासूमियत से बोला "आंटी यहां तो जो भी हमें कुछ खाने को देता है तो वह फोटो जरुर लेता है।कभी कभी तो पैकेट एक देते हैं पर फोटो दो,तीन पैकेट के साथ खींचते हैं ।"

उसकी यह बात सुनकर मानवता पर शर्मिंदा होने के अलावा मेरे पास कोई शब्द नही थे और मैं यह सोचती रह गई की क्या मानवता का ढ़ोग करने की आवश्यकता है समाज के ठेकेदारों को ।
*मेरठ (उत्तर प्रदेश)

 


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