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विरहता 






*संजय वर्मा 'दॄष्टि' 


 

विरहता के समय 

आती है यादें

रुलाती है यादें 

पुकारती है यादें 

ढूंढती नज़र 

उन पलों को जो गुजर चुकें 

सर्द हवाओं के बादलों की तरह 

खिले फूलों की खुशबुओं से 

पता पूछती तितलियाँ 

रहकर उपवन को महकाती थी कभी 

जब फूल न खिलते ।

उदास तितलियाँ  

जिन्हें बहारों की विरहता 

सता रही 

एहसास करा रही 

कैसी  टीस उठती है मन में 

जब हो अकेलापन 

बहारें ना हो ।

विरहता में आँखों 

का काजल बहने लगता

तकती निगाहें ढूंढती 

आहटों को जो मन के दरवाजे पर 

देती थी कभी हिचकियों से  दस्तक

जब याद आती तुम्हारी

विरहता में ।   

 

*संजय वर्मा 'दॄष्टि' 

मनावर जिला धार (म प्र )



 


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