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डिजिटल दम्पत्ति काव्य गोष्ठी


देश में लॉकडाउन की स्थिति को देखते हुए साहित्य एवम समाज को समर्पित संस्था "परम्परा" गुरुग्राम द्वारा साहित्य की अविरल धारा बहाने हेतु काव्य गोष्ठियों का अनवरत क्रम ज़ारी है। इसी क्रम में अंतरराष्ट्रीय मातृ दिवस के अवसर पर एक अंतर्राष्ट्रीय डिजिटल काव्य गोष्ठी "आज की शाम-माँ के नाम" का आयोजन रविवार, दिनांक 10 मई'2020 को किया गया। इसमें अपने-अपने घरों से ही मोबाइल के माध्यम से कविताएं सुनाकर, गोष्ठी सफलतापूर्वक आयोजित की गई । गोष्ठी की अध्यक्षता हापुड़ से वरिष्ठ साहित्यकार , काव्यदीप संस्था के संरक्षक डॉ अशोक मैत्रेय  जी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में नोएडा से उपस्थित रहे वरिष्ठ गीतकार , कायाकल्प संस्था के संस्थापक डॉ अशोक मधुप जी। मुम्बई से प्रसिद्ध फिल्मकार, अनेकों सीरियल व फ़िल्म के लेखक,स्क्रिप्ट राइटर श्री राजेश बेरी जी अति विशिष्ट अतिथि के रूप में विराजमान रहे।गुरुग्राम से निर्धन व ज़रूरतमंद परिवारों के लिए समर्पित सुप्रसिद्ध समाजसेविका डॉ नलिनी भार्गव जी ने विशिष्ट अतिथि की भूमिका निभाई। गोष्ठी में सान्निध्य प्राप्त हुआ उन्नाव से शब्द गंगा संस्था के अध्यक्ष श्री विनय दीक्षित 'आशु' जी का तथा दुबई से विशेष रूप से उपस्थित रहीं महिला काव्य मंच, दुबई की अध्यक्षा श्रीमती स्नेह देव जी।
 गोष्ठी का आयोजन एवम संचालन परम्परा की संयोजिका श्रीमती इन्दु "राज" निगम व उनके पति परम्परा के संस्थापक अध्यक्ष राजेन्द्र निगम "राज" द्वारा किया गया। इस गोष्ठी में कोरोना वायरस से लड़ने हेतु जागरूकता फैलाने वाली रचनाओं के साथ ही अन्य विषयों पर भी रचनायें प्रस्तुत की गईं। प्रतुत रचनाओं की एक बानगी इस प्रकार है-


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सूरज से भी हैं बड़े, मेरी मां के हाथ।
थाली से चंदा बंधा, इसी सोच के साथ।।
(डा. अशोक मैत्रेय, हापुड़)
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माँ अब तुमको क्या बतलाऊँ, 
तुम बिन रहा नहीं जाता है।
किससे कहूँ वेदना अपनी,
कुछ भी कहा नहीं जाता है।
(डॉ अशोक मधुप, नोएडा)
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माँ पर कुछ पंक्तिया लिखने के लिए
मैं जब भी कलम उठता हूं 
हाथ रुक जाते हैँ, 
कुछ समझ नहीं पता हूं 
(राजेश बेरी, मुम्बई)
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“तुम लौट आओ माँ 
तुम बस लौट आओ
अपनी बाँहों में बाँध मेरा मस्तक चूम लो
अपनी गोद में मेरा सिर रख
मुझे पुन: निडर कर दो”
(डॉ नलिनी भार्गव, गुरुग्राम)
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मातृ शक्ति से बढ़कर कोई शक्ति नहीं,
माँ बनना जननी का एक तपस्या है।
इसीलिए तो बिना जने ही राधा बनी
 कर्ण की और यशोदा कान्हा की मइया हैं।
(विनय आशु, उन्नाव)
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मम्मी,ममत्व भरा अस्तित्व तुम्हारा
हम टुकड़े तुम जीवन सारा
मम्मी कहाँ चली गयी तुम...
(स्नेहा देव, दुबई)
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जीवन उपवन हो जाए ये तन-मन कुंदन हो जाए
जलती हुई दुपहरी में हरियाला सावन हो जाए
माँ के आशीषों की महिमा ईश्वर से भी बढ़कर है
महक उठे हर एक डगर सारा वन चन्दन हो जाए
(इन्दु "राज" निगम, गुरुग्राम)
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कितनी बार हाथ में सुई चुभी
एक फूल तब खिला रुमाल पर
(नेहा वैद, नोएडा)
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लोरी दे सुलाती माँ वो रातें याद आती हैं 
कहानी जो सुनाती माँ वो बातें याद आती हैं 
(दलबीर फूल, रेवाडी़)
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मेरी मां परी है मेरी मां परी हैं
मै छाया हूं उसकी वो मेरी छवि है
(दिव्या वरमानी, फरीदाबाद)
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मां सब से बड़ी है पूजा
नहीं मां के जैसा दूजा,
जिसने भी इसे महसूसा 
उसने ही इसे है पूजा।।
(ज्योति नारायण, हैदराबाद)
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जिन्दगी से जकडी एक जन्जीर नही होती ,
धरती से आसमा तक एक पीर नही होती |
कोई राम रहीम या मसीहा हो प्यारे ,
मॉ से बढकर कोई शमसीर नही होती ||
(सारिका तिवारी, उन्नाव)
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मां तेरे बारे में क्या लिखूं , तू तो लाजवाब है।
मां शब्द  में  ही समाया, ये सारा  ब्रम्हांड है।
मां  पर इस दुनिया ने, बहुत कुछ लिख डाला है। 
सोचा लिखूं मैं भी, तो मां को खुदा लिख डाला है।
(वीरेन्द्र निगम, उन्नाव)
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अपनी चाहत सबके दिल में देख के कितनी खुश हो जाती ,


काश अगर मां इस जीवन में एक बार फिर से आ जाती।                    
(जे० एन० श्रीवास्तव "गोविंद",लखनऊ)
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लाख काँटे हो चमन में , गुलों की आब कम नहीं होती।
लगी हो आग सीने में , किसी बारिश से कम नहीं होती।
कितने ही बहाने हँसने के हों मगर वीणा, 
वो बच्चे हँसना भूल जाते हैं,
जिनके माँ नहीं होती।
(डॉ वीणा मित्तल, ग़ाज़ियाबाद)
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तो मुझसा भाग्य-शाली
कौन होगा इस जमाने में
मेरी गर्दन भी कट के मां,
तेरे चरणो मे‌ चढ जाये
 (हलचल हरियाणवी, रेवाड़ी)
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तुझे कैसे भूल जाऊँ मेरी माँ मुझे बता दे
कहाँ तक मैं ग़म उठाऊँ, मेरी माँ मुझे बता दे
मेरा दिल तड़प रहा है कि लिपट के तुझसे रोऊँ
तेरे पास कैसे आऊँ ,मेरी माँ मुझे बता दे।
 (तूलिका सेठ, ग़ाज़ियाबाद)
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 गीली लकड़ी फूँक फूँक कर जला रही है माँ
मिट्टी के चूल्हे पर रोटी बना रही है माँ
(राजेन्द्र निगम "राज", गुरुग्राम)
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