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अब कोई अपना लगता ही नहीं



*राजीव डोगरा 'विमल


हे!ईश्वर
मैं कुछ खास नहीं
फिर भी
गुफ्तगू करता हूं तुमसे
दुनिया का हाल छोड़कर।


लोग पूछते हैं मुझसे
क्यों गुमसुम से रहते हो ?
क्या कोई दर्द मिला है ?
किसी अनजान शख्स से ?


अब क्या कहूं मैं
और कैसे कहूं
तेरी प्रेम अनुभूति
किसी से बोलने ही नहीं देती।


लोग पूछते हैं
क्यों तुम अजनबीयों की तरह
इधर-उधर घूमतें हो
अपनी फकीरी लिए।


मगर मैं कैसे कहूं
तुम्हारे सिवा मुझे
अब कोई
अपना लगता ही नहीं।


*राजीव डोगरा 'विमल',ठाकुरद्वारा


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