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सुनो मनुष्य



*डॉ प्रतिभा सिंह

 


सुनो मनुष्य!

अभी छिपे रहो अपनी -अपनी आलीशान

ईंट- पत्थर की गुफाओं में।

जिसे स्वर्गिक बनाने के लिए तुमने चूसे हैं

 न जाने कितने मजबूरों के सिसकते हुए खून।

देख लो अपने आस- पास 

तुम्हारे कैद हो जाने से 

प्रकृति जी उठी है एकबार फिर से।

सूर्य आज भी पूरब में उदित होकर

पश्चिम में डूब  रहा है।

ठीक वैसे ही चाँद तारे मुस्करा रहे हैं

आकाशगंगा का हरएक तारा जो धूमिल हो गया था

तुम्हारे कुकर्मो के कारण अब चमकने लगा है।

सप्तर्षि मंडल दुखी मन से बैठकर चर्चा कर रहे हैं

तुम्हारी ही करनी के फल पर।

हवाएं गुनगुना रही हैं

पंछी चहचहा रहे हैं

पशु घूम रहे हैं जंगलों में निर्भीक

पर्वतशिखर गर्व से सिर उठाये देख रहे हैं

तुम्हारी बेबश हो चुकी आंखों में।

गंगाजल निर्मल होकर फिर से औषधियुक्त हो रहा है

वह सबकुछ ठीक हो रहा है जो कुछ भी प्राकृतिक है।

ठहरी हुई है तो तुम्हारी भौतिक

और बनावटी दुनियाँ।

बड़े -बड़े कारखाने

जो दूषित करते थे जल, थल और वायु को।

वह वायुयान जो भेदते थे

रुई के फाहों से मुलायम बादलों के मौन को

वे सड़कों पर दौड़ती सस्ती -महंगी गाडियाँ

जो तुम्हारे स्टेटस का सिंबल थीं।

वह सबकुछ ठहरा हुआ है जो तुमने बनाया है।

नहीं काम आ रहा है

अब कोई भी हथियार

जिसे बनाने में तुमने गुजार दी सदियां।

अब चेत जाओ समय से

तो ही अच्छा है

जान लो कि तुम्हारी लौकिक दुनियाँ 

पारलौकिक से बड़ी नहीं हो सकती।

अभी चुप रहो

प्रकृति हिसाब लिख रही है

समय के कागज पर

तुम्हारी किस्मत की स्याही से।

और हाँ

बन्द करो यह अपना 

आपसी विवाद, लड़ाई- झगड़ा।

जान लो

की यह रुदन ,हास्य या फिर मनोरंजन का नहीं

चिंतन का समय है।

वरना नष्ट हो जाएगी तुम्हारी समूची सभ्यता

बिल्कुल 

सिंधु, सुमेरिया और मेसोपोटामिया की तरह।।

 

*डॉ प्रतिभा सिंह

किशनपुर ,उत्तर प्रदेश

 

 


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