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जैसे चांद सितारे रहते नीलगगन में साथ



*कीर्ति कोमल


पर्वत झरने नदिया सागर सब ऐसे हैं साथ।
जैसे चांद सितारे रहते नीलगगन में साथ।


दूर तलक खेतों में दिखतीं स्वर्णिम गेहूँ बाली।
यह धरती करती रहती है खुद अपनी रखवाली।
पतझण सर्दी गर्मी मौसम सबकी ये ऋतुनाथ।
जैसे चांद सितारे रहते नीलगगन में साथ।


कभी नीम सी कड़वी है ये कभी शहद सी मीठी।
कभी लौंग के चटकारे से कभी अमरिया खट्टी।
रात इसी के वस में रहती दिन की है अहनाथ।
जैसे चांद सितारे रहते नीलगगन में साथ।


सहती है ये बड़े प्यार से खुद पर कितनी मार।
हर बार जीतना होता हमको ये जाती है हार।
फिर भी कभी छुडाती ना ये हमसे अपना हाथ।
जैसे चांद सितारे रहते नीलगगन में साथ।


*कीर्ति कोमल, इंदौर


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