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सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करता उपन्यास "खुशबू बन गई वह "

















 'खुशबू बन गई वह ' में उनके गहरे मन को छूती हर बात की गहरी  पड़ताल की जाकर बेहतर तरीके से  अपनी भावनाएं  व्यक्त की है । वर्षो से साहित्य की पूजा करती आ रही निति अग्निहोत्री  ने ज्यादातर कहानियों में रिश्तों के ताने बानों को प्रेरणा स्वरुप ढाला है ।उपन्यास में  कही बिछोह का संदेश ,तो कही विलग होने का दर्द ,सुख दुख ,विश्वास ,ईमानदारी आदि पढ़कर ऐसा लगता है कि मानों गुहार के साथ हौसला अफजाई के दस्तावेज दुनिया के समक्ष अपनी बातों को रख रहा हो ।और ये यादें बनकर समय-समय पर तमाम हो रहे परिवर्तनों पर प्रत्यक्ष गवाह बन के उभर रहे हो ।मुझे लगता है। हर अन्याय ,हर गलती ,हर जुर्म के पीछे जैसे सिस्टम ही है । सामाजिक सिस्टम ऐसा है ,इसलिए औरते सहती है ।चली गई या किस्मत की मार को सहने के लिए विवश रही प्रभाती की जिंदगी एवं जिंदगी से जुड़े पात्र उनके  हुए पलों को एक अलग रंग भरते है ,संघर्ष की कहानी मन को झकजोर देती है ,ये  हमारे आसपास की घटना होने  का अहसास भी करवाती है । यही तो उपन्यास  की विशेषता है की  वो  मन को छूता जाता है और पठनीयता की आकर्षणता में पाठक को बांधे रखता है।एक वाक्या -'सुमन ,तुम मुझे बहुत ऊँचे आसान पर बैठा रही हो,जबकि में तो गुनाहों का एक तरह से प्रायश्चित ही कर रही हूँ ,मै चाहती हूँ कि मेरे गुनाहों का पलड़ा, मेरे अच्छे कर्मो के पलड़े से हल्का रहे, ताकि अपराध-बोध से छुटकारा पा सकूँ। में अपने अच्छे कर्मो को उस उंचाई तक पहुँचाना चाहती हूँ ,जहाँ से मेरे गुनाह भी गौण या छोटे दिखाई दें. मेरे गुनाह भी महक जाए इतनी खुशबू मेरे सद्कर्मो की बढ़ जाए। इतना करके मुझे आत्मसंतोष प्राप्त होगा। और यही मेरा स्वार्थ ही तो है। निति अग्निहोत्री इस तरह से ही समकालीन साहित्य परिचर्चा और स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में भी अपनी छाप छोड़ती आई है ।निति अग्निहोत्री के ह्रदय अनुभव ख़जाने में श्रेष्ठ विचार का भंडार समाहित है जो समय -समय पर हमे ज्ञानार्जन में वृद्धि कराता आया है ।व्यव्हार को दिशा बताती पंक्तियों में नारी उत्पीडन व्यवहार की दुर्दशा को भी बड़े ही सार्थक ढंग से प्रस्तुत किया है ।इस तरह की  संत्रास और पीड़ा का उन्मूलन होना चाहिए ताकि स्त्री  खुशहाल जीवन जी सके । बेहतर संवादात्मक पहलू ह्रदय वेदना को झकजोर जाते है ।उल्लेखनीय यह है निति अग्निहोत्री को साहित्य से अटूट प्रेम है वे साहित्य को लिखने में सदैव जागरूक रहकर विषयों के पात्रों  में जान फूंक  देती है । लेखन की शैली संग्रहणीय तो है ही साथ ही स्तरीयता के मुकाम हासिल भी करती जा रही है । जो की लेखिका की लेखनीय परिपक्वता को प्रतिबिंबित करता है । यह उपन्यास  निसन्देह साहित्य  जगत में अपने परचम लहराएगा । मार्मिकता के पहलुओं की पहचान कराने में यादगार सिद्ध अवश्य होगा । यही  शुभकामना है ।




 


उपन्यासकार :निति अग्निहोत्री 57 ,साई विहार इंदौर (मप्र )







मूल्य :एक सो पचास रूपये 









प्रकाशक : दिशा प्रकाशन,138 /16 त्रिनगर दिल्ली -110035 









प्रथम संस्करण :2012 









 

समीक्षक 

*संजय वर्मा ' दॄष्टि' मनावर (धार )









                                                                                     

















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