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उपेक्षा की एक और दास्तान वरिष्ठ नारायण सिंह



*डॉ देवेन्द्र जोशी*


व्यक्ति की कीमत जानी जाती है मरने के बाद में


हर अच्छी बात कड़वी लगती है स्वाद में


जीने वालों की यहां कोई कद्र नहीं है


बाजे बजा करते हैं मरने वालों की याद में


अपनी ही लिखी कविता की ये पंक्तियां तब कमतर प्रतीत हुई जबकि इस बार मरने वाले की याद में बाजे बजना तो दूर उसका शव उठाने के लिए एक अदद एम्बुलेंस का बन्दोबस्त भी नहीं हो पाया और देश का एक महान गणितज्ञ काल के गाल में समा गया । जी हॉ यहां बात हो रही है दुनिया को स्पेस थ्योरी देने वाले महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह की जिनका बीते बृहस्पतिवार बिहार के एक नगर में गुमनामी की जिन्दगी बसर करते हुए निधन हो गया। दुर्भाग्य देखिए कि जब अस्पताल से शव लाने के लिए परिजनों ने एम्बूलेंस की मांग की तो यह कह कर उन्हें टरका दिया गया कि आपका घर पास में ही है एम्बूलेंस की क्या जरूरत।



जब सारा देश 14 नवम्बर को बाल दिवस मनाते हुए बच्चों को अपने बजर्गों और महापरूषों के सम्मान का पाठ पढा रहा था तब बिहार के एक कस्बे आरा से आई इस खबर ने सोचने को विवश कर दिया कि आखिर कब तक देश प्रतिभाएं हमारे दोहरे चरित्र का शिकार होती रहेगी। वशिष्ठनारायण कई दशकों से सिजोफ्रेनिया अर्थात स्मृति प्रतिभा लगभग निरर्थक हो चुकी थी। जिसके जरिए उन्होंने सारी दुनिया में अपनी काबलियत का परचम फहराया था। वशिष्ठ नारायण सिंह आज एक उदाहरण है। इस बात का कि अपनी महान प्रतिभाओं के साथ हम किस तरह का बर्ताव करते हैं। बिहार के एक पिछडे गांव से निकल कर कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी तक पहुंचकर अपनी प्रतिभा की मिसाल सारी दुनिया के समक्ष पेश करने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह की दास्तान अपने समय के महान गणितज्ञ रामानुज की याद दिलाती है जिनको भी भारत में ऐसी ही अनदेखी और उपेक्षा का शिकार होना पड़ा था। वे जब तक यहां थे उनकी हैसियत एक मामली क्लर्क की थी, जब वे कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी पहुंचे तो वहां न केवल उनकी प्रतिभा को पहचान मिली बल्कि उन्हें दुनिया के महान गणितज्ञों में शुमार किया गया। वशिष्ठ नारायण सिंह के साथ भी यही हुआ। उनकी प्रतिभा को हम ठीक तरह से पहचान नहीं पाए। लेकिन जब वे कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी पहुंचे तो वहां उनके अवदान के लिए न सिर्फ उन्हें पी एच डी की उपाधि प्रदान की गई बल्कि एसोसिएट प्रोफेसर की नियुक्ति से भी नवाजा गया लेकिन भारत के गांव से निकले वशिष्ठ नारायण सिंह की आत्मा भारत में ही बसी थी इसलिए वे स्वदेश लौट आए। यहां एक - दो संस्थानों में नौकरी भी की लेकिन पारिवारिक उलझन, बीमारी और उपेक्षा के चलते उनकी जिन्दगी गुमनामी के अंधेरे में खो गईदुर्भाग्य कि हम उनकी महान प्रतिभा का कोई सूत्र सहेज कर नहीं रख पाए। यही हाल एक समय महान वैज्ञानिक हरगोविन्द खुराना का हुआ थाआखिर कब हम अपनी प्रतिभाओं को सम्मान देना सीखेंगे।


उनके जाने के बाद प्रधान मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक की श्रद्धांजलियों और राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि का क्या कोई अर्थ शेष रह जाता है, जरा सोचें ? प्रतिभा पलायन मानव पूंजी रूपी संसाधनों का हस्तांतरण है। जब किसी देश से बुद्धिजीवी वर्ग जैसे डॉक्टर , इन्जीनियर ,टेक्नीशियन ,वैज्ञानिक ,शोधकर्ता अन्य देशों में विशेष सुविधाओं के कारण प्रस्थान कर जाते हैं तो यह स्थिति निर्मित होती है। यह सच है कि प्रतिभा किसी एक देश की परिरक्षित निधि नहीं है।अपने कुशल और प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों की हानि से विकासवादी देश सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। इसकी मुख्य वजह विकासशील देशों में वेतन और अन्य सुविधाओं के रूप में प्राप्त होने वाले लाभ कम होना है।


प्रत्येक वर्ष हजारों उच्च प्रतिभाशाली पेशेवर भारत छोड़ विदेशों में रहने लगते हैं। वैश्विक रूप से 20 बड़े देश हैं जिनकी 49 प्रतिशत जनसंख्या वैश्विक प्रवासी है। विदेशों में रहने प्रवासी भारतीयों की संख्या सन् 2000 मे 8 मिलियन थी जो 2017 में बढकर 16.6 मिलियन हो गई। हमारा सबसे बड़ा स्किल्ड मैनपावर है। चीन के बाद हमारे पास सबसे अधिक 65 हजार वैज्ञानिक हैं। दुनिया के सबसे ज्यादा इंजीनियरिंग कालेज भारत में हैं। भारत में अमेरिका से ज्यादा हाई-टेक रिसर्च इन्स्टीट्यूट हैं। यहां पॉलीटेक्निक आरटीआई की संख्या ज्यादा है। नेशनल लेबोरेटरीज 44 से ज्यादा है। उच्च वेतन और सुविधाओं के कारण भारतीय युवा विदेश जा रहे हैं।


भारत से उच्चतर अध्ययन के लिए विदेश जाने वालों में से अधिकांश वापिस नहीं आते हैंप्रतिभा पलायन की मुख्य वजह अवसरों में कमी , राजनैतिक अस्थिरता, आर्थिक अवसाद, स्वास्थ्य जोखिम, पारिवारिक प्रभाव,व्यक्तिगत वरीयता, बेहतर कैरियर की महत्वाकांक्षा, उपेक्षा , अनदेखी आदि प्रमुख है। इन सबको दूर कर भारत से प्रतिभा पलायन को रोका जा सकता है। हमारे पास विश्व की तृतीय विशालतम उच्च शिक्षा प्रणाली हैजिसकी अद्भुत गुणात्मक विविधताएं आज समस्याएं बन गई हैं। भारत में पढ़लिख कर तैयार हुआ दिमाग अगर यहां रूकने के बजाय अमेरिका चला जाएग तो अन्ततः इसका लाभ अमेरिका को ही मिलगा,भारत को नहीं। वहां जाकर रुपये की तुलना में ऊंचा डॉलर का पैकेज पाकर भारतीय प्रतिभाएं अपने आपको भले ही खुशकिस्मत समझें। लेकिन जो सम्मान और गौरव यहां के सस्ते पैकेज में है वह उन्हें वहां के महंगे पैकेज में कभी नहीं मिल सकता। देश का हर प्रतिभाशाली युवा सच्चाई को जानता है। कोई भी खुश होकर विदेश में जाकर अपनी काबिलियत का जौहर दिखाकर खुश होना नहीं चाहता। लेकिन हालात उसे ऐसा करने को विवश करते हैं। जब देश की प्रतिभाओं का हाल रामानुज, हरगोविन्द खुराना या वशिष्ठनारायण सिंह जैसा होगा तो कौन अपनी प्रतिभा कुंठित होने की कीमत पर मुल्क में ठहरना चाहेगा।देश के युवा जानते हैं कि अमेरिका में वे कितनी भी प्रगति कर लें लेकिन वहां उनकी गिनती दोयम और तीसरे दर्जा के नागरिक के रूप में ही होगी। फिर भी प्रतिभाएं विदेश पलायन के लिए इसलिए मजबर है कि उनकी योग्यता और शिक्षा का यहां वो सम्मान नहीं है जो विदेशों में है। अगर अपने देश में भी अमेरिका जैसा अवसर और सम्मान मिले कौन सात समन्दर पार अपनी किस्मत चमकाने जाएगा।


*डॉ देवेन्द्र जोशी,उज्जैन










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