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तीन लघु कविताएँ


1-
चेहरा नदी का
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नहीं जानती
नदी भी
कब वह बही
और कब रही
ख़ामोश,
हो जाती है
समाहित
सागर की लहरों में,
काश पढ़ सकती दुनिया
चेहरा नदी का!
*
2-
उड़ा दो सन्नाटे को
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अनंत बेचैनी
और
पल-पल घबड़ाहट के
झंझावातों से
बाहर निकलो,
उड़ा दो
सन्नाटे को
फूँक दो 'फुँकनी' से
आकाश की
चौखट की ओर!
*
3-
अनन्त परिधि में
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पेड़-पौधे/नदी-ताल
चाँद-सितारे/जड़-चेतन
धरती-आकाश
सबमें तो तुम हो
और जब
ढूँढ़ता हूँ तुम्हें
तो मैं
स्वयं
विलुप्त हो जाता हूँ
अनन्त परिधि में
किसी बिन्दु में!
*
*डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर', 24/18, राधा नगर, फतेहपुर (उ.प्र.) 212601,मो: 9839942005


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