प्रेमचंद का साहित्य आज भी समाज की संवेदनाओं का दर्पण : संजय मेहता
संस्कार भारती की मासिक संगोष्ठी 'कला विमर्श' का आयोजन
उज्जैन। संस्कार भारती, उज्जैन महानगर एवं सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कला शिक्षा विभाग के संयुक्त तत्वावधान में मासिक संगोष्ठी श्रृंखला "कला विमर्श" के अंतर्गत रविवार को शलाका दीर्घा सभागृह में "दृश्य और संवेदनाएं : प्रेमचंद की रचनाओं में नाटकीय तत्व" विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं संस्कार भारती के ध्येय गीत के साथ हुआ। संस्कार भारती, उज्जैन महानगर की अध्यक्ष माया बदेका ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी की भूमिका प्रस्तुत की तथा विषय की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
विस्तृत जानकारी देते हुवे संस्था के सह प्रचार प्रमुख मुकेश पंड्या ने बताया की कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वरिष्ठ रंगकर्मी,लेखक एवं चिंतक संजय मेहता (भोपाल) ने अपने उद्बोधन मे कहा कि प्रेमचंद की रचनाएँ केवल साहित्य नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज हैं। उनके कथा-साहित्य में दृश्यात्मकता, संवाद, चरित्रों की सहजता और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है, जो उन्हें रंगमंच के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाता है। उन्होंने कहा कि नाट्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करना भी है। प्रेमचंद के पात्र आज भी हमारे समय के प्रश्नों से संवाद करते हैं और यही उनकी कालजयी प्रासंगिकता है।
उन्होंने भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का उल्लेख करते हुए कहा कि नाट्य जीवन का समग्र प्रतिबिंब है तथा साहित्य और रंगमंच का संबंध मनुष्य की संवेदनाओं से है। प्रेमचंद की रचनाओं में यही संवेदनात्मक ऊर्जा उन्हें मंच पर जीवंत बनाए रखती है। व्याख्यान के पश्चात आयोजित प्रश्नोत्तरी सत्र में विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने प्रेमचंद के साहित्य, रंगभाषा, दृश्य-संरचना तथा समकालीन रंगमंच से जुड़े प्रश्न पूछे, जिनका संजय मेहता जी ने विस्तारपूर्वक उत्तर दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्कार भारती के अखिल भारतीय सह कोष प्रमुख श्रीपाद जोशी ने की।उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य और रंगमंच की परंपरा संवेदनशील समाज के निर्माण का आधार है। प्रेमचंद का साहित्य आज भी मानवीय मूल्यों, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक दृष्टि का सशक्त स्रोत है। उन्होंने युवा पीढ़ी से भारतीय साहित्य और रंगपरंपरा के गंभीर अध्ययन तथा मंचीय प्रयोगों से जुड़ने का आह्वान किया। कार्यक्रम का संचालन शुभम शर्मा ने किया। कार्यक्रम का संयोजन नाट्य संयोजक शिरिश सत्यप्रेमी एवं सह-संयोजक अंकित जोशी ने किया। अंत में दुर्गाशंकर सूर्यवंशी ने आभार व्यक्त किया।कार्यक्रम की जानकारी संस्था के मीडिया प्रमुख जयंत तेलंग ने दी।



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