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वीणा की वाणी: साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं पर केंद्रित दो दिवसीय गहन विमर्श का आयोजन

वीणा की वाणी 
साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं पर केंद्रित दो दिवसीय गहन विमर्श का आयोजन 

इंदौर। साहित्य की ऐतिहासिक नगरी इंदौर में 'वीणा की वाणी' शीर्षक के अंतर्गत देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं पर केंद्रित दो दिवसीय गहन विमर्श का आयोजन 30-31 मार्च 2026 को मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति परिषद द्वारा देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कंप्यूटर साइंस सभागार में किया गया। इस कार्यक्रम ने साहित्य, पत्रकारिता और आधुनिक तकनीक के अंतर्संबंधों पर नई दृष्टि साझा की।

उद्घाटन सत्र

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन तथा सरस्वती वंदना के साथ हुआ। सत्र में श्री उमापति दीक्षित जी (केन्द्रीय हिंदी निदेशालय), प्रो. राकेश सिंघई जी (कुलगुरु, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय), श्री राकेश शर्मा जी (संपादक, 'वीणा'), डॉ. विकास दवे जी (निदेशक, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी) एवं सोनाली सिंह नरगुंदे जी (विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग) मंचासीन रहे। 

स्वागत उद्बोधन में मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे जी ने कहा कि साहित्य जगत में कार्य करना हो तो समरसता की भावना लेकर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि कर्नाटक की एक शोधार्थी बहन किसी गांव में अक्षम बच्चों को संस्कृत भाषा में प्रशिक्षित करने का प्रयास कर रही थी और उन्होंने जाति भ्रम को दूर कर सभी के बीच समरसता का भाव पैदा किया। ऐसे हमारे देश में अनेक जीवंत उदाहरण हैं जहाँ युवा बंधु-भगिनी इस प्रकार के कार्य कर रहे हैं।

डॉ. दवे ने कहा, “हम इन पत्रिकाओं को एक सूत्र में बांधना चाहते हैं।” उन्होंने बताया कि इन दो दिनों में साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के विषय पर विस्तृत चर्चा होगी और एक से एक धुरंधर पत्रकार एवं साहित्यिक मनीषी अपने विचार व्यक्त करेंगे। उन्होंने श्री कृष्ण बेड़ेकर जी का उदाहरण देते हुए बताया कि उस समय वे अंतर्देशीय साहित्य पत्रिका का हस्तलिखित संपादन करते थे। यह बहुत साधारण बात नहीं थी, इसमें कितनी मेहनत लगती है, यह हम सभी भली-भाँति जानते हैं। उन्होंने लघु कलेवर की पत्रिकाओं के संकट पर भी गंभीर विचार व्यक्त किए।

मुख्य वक्ता श्री राकेश शर्मा जी (संपादक, 'वीणा') ने अपने उद्बोधन में रेखांकित किया कि हिंदी पत्रकारिता अपने 200 गौरवशाली वर्ष पूर्ण कर रही है, जो हम सभी के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने 'वीणा' पत्रिका के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 'वीणा' का अर्थ ही 'वागर्थ' है।उन्होंने बल दिया कि “साहित्य स्थाई पत्रकारिता है” और “पत्र-पत्रिका स्थाई साहित्य हैं”। उन्होंने स्पष्ट किया कि इतिहास की स्याही बहुत सौभाग्य से मिलती है और वही तथ्य दर्ज होते हैं जो सोच-समझकर पदचाप के साथ चलते हैं।

तकनीक के बदलते दौर पर चर्चा करते हुए शर्मा जी ने कहा कि एक समय था जब मनुष्य के जीवन में मशीनों के पूर्व और बाद के साहित्य में अंतर आया था, अब AI के प्रवेश से पूर्व और बाद के साहित्य में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। यह एक विकट समय है, क्योंकि जब तक कविता हाथ से लिखी जाती थी, उसमें प्राण थे, लेकिन AI और तकनीक की संवेदना उस गहराई तक नहीं पहुँच सकती।

पत्रिकाओं के योगदान के संदर्भ में उन्होंने 1903 में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में 'सरस्वती' पत्रिका द्वारा हिंदी साहित्य की जो प्रतिष्ठा गढ़ी, उस परंपरा को आगे बढ़ाने में देवनागरी और अन्य पत्रिकाओं के योगदान को याद किया।उन्होंने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इतिहास की स्याही है जो बहुत सौभाग्य से मिलती है। 'वीणा' जैसी पत्रिकाएँ सत्य को आगे बढ़ाने और भ्रम को ध्वस्त करने का माध्यम हैं। विमर्श के दौरान उन्होंने यह कड़ा संदेश भी दिया कि “जो राजनीति के लिए अपना चोला बदलता है, वह कुछ भी हो सकता है, लेकिन वह एक सच्चा व्यक्ति या साहित्यकार कभी नहीं हो सकता।”

उमापति दीक्षित जी ने उद्बोधन के साथ शिव तांडव स्तोत्र का पाठ किया। प्रो. राकेश सिंघई जी ने अपने इंजीनियरिंग कॉलेज के दिनों के संस्मरण साझा किए, जहाँ साहित्य और समीक्षा की जीवंत परंपरा थी। उन्होंने भाषा की सजगता पर ध्यान इंगित किया। कार्यक्रम में साहित्य जगत की कई लब्धप्रतिष्ठ विभूतियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उद्घाटन सत्र में 'समरसता और संघ' (सोनाली सिंह नरगुंदे जी द्वारा संपादित पुस्तक) का विमोचन हुआ। आभार ज्ञापन सोनाली सिंह नरगुंदे जी ने किया।

प्रथम सत्र

“जो दिखता है वही बिकता है” (कलेवर, लेआउट में रोचक पठनीय को दर्शनीय भी बनाएँ) विषय पर हुआ। संयोजन संजय पटेल जी ने किया, वक्ता : मनोज राठौर जी (ग्राफिक डिजाइनर), हेमंत खुराना जी (प्रिंट तकनीकी विशेषज्ञ), श्रीराम दवे जी (संपादक, समावर्तन पत्रिका) रहे।

संजय पटेल जी के पहले प्रश्न पर हेमंत खुराना जी ने बताया कि हस्तलिखित पत्रिका के दौर से अब तकनीकी समय में लेखक की ओर से बदलाव आया है, लेकिन गलतियाँ अब भी बनी हुई हैं। तकनीक ने आगे बढ़ाया है, पर समय सीमा में बंधकर त्रुटिपूर्ण विषय-वस्तु या चित्र नहीं भेजने चाहिए।

चर्चा का मुख्य केंद्र रहा-लेआउट में रोचकता का अभाव और पठनीय को दर्शनीय बनाने की आवश्यकता। तकनीक बनाम परंपरा, हस्तलिखित पत्रिकाओं से तकनीकी युग में संपादन की बदलती चुनौतियाँ, त्रुटियों की संभावना आदि पर गहन मंथन हुआ।

मनोज राठौर जी ने जोर दिया कि पत्रिका का आवरण उसकी पहली पहचान है। यह प्रवेश द्वार है जिसे देखकर पाठक भीतर प्रवेश करता है। हिंदी भाषा में आकर्षण की कोई कमी नहीं है, बस सही प्रस्तुतीकरण की जरूरत है। उन्होंने 'वीणा' जैसी पत्रिकाओं के उच्च मानकों का उदाहरण दिया।

हेमंत खुराना जी ने तकनीक को वरदान और अभिशाप दोनों बताया। उन्होंने GIGO (Garbage In, Garbage Out) सिद्धांत पर चर्चा की और पिक्सल, रिज़ॉल्यूशन, DPI तथा गुणवत्ता के अंतर्संबंध स्पष्ट किए।

श्रीराम दवे जी ने कहा कि देशभर में लगभग 4500 पत्रिकाएँ निकलती हैं, जो दो वर्गों में विभाजित हैं -धनाढ्य पत्रिकाएँ (भव्य प्रसार और लेआउट) तथा स्वयं के खर्च पर निकलने वाली पत्रिकाएँ (सीमित संसाधनों में साहित्य सेवा)। उन्होंने संपादक के कार्य को 24/7 चलने वाला मस्तिष्क बताया और अपनी भूलों से सीखने तथा जल्दबाजी में रचना न भेजने की सलाह दी।

डॉ. विकास दवे जी और संजय पटेल जी ने तकनीकी सवाल उठाए। मनोज राठौर जी ने संपादक और डिजाइनर के बीच तालमेल की आवश्यकता बताई। चर्चा में 4 कलर प्रिंटिंग के साथ पाँचवें रंग (Special Colors) तथा अच्छी गुणवत्ता के कागज़ (GSM) के महत्व पर भी बात हुई।

सत्र का सार यह रहा कि डिजिटल युग में मोबाइल आधारित पढ़ाई बढ़ रही है, लेकिन साहित्यिक पत्रिकाओं की प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। समावर्तन जैसी पत्रिकाओं के विशेषांक प्रेरणादायी हैं। सफल पत्रिका वही है जो तकनीक का सहारा ले, लेकिन मौलिकता, भाषा की शुद्धता और वैचारिक गहराई से समझौता न करे।

द्वितीय सत्र

“थोड़ी हंसी थोड़ी खुशी” (कार्टून विधा पर चर्चा) पर केन्द्रित रहा। मुख्य वक्ता :डॉ. देवेंद्र शर्मा जी रहे, संयोजन :डॉ. विकास दवे जी ने किया। 

डॉ. विकास दवे जी ने बताया कि डॉ. देवेंद्र शर्मा जी की कूची के साथ-साथ उनकी कलम भी चलती है। सत्र में साहित्य और कार्टून विधा पर सार्थक संवाद हुआ। डॉ. देवेंद्र शर्मा जी को शुरू में अकेले मंच पर बैठना था, लेकिन उन्होंने डॉ. विकास दवे जी को मंच पर आमंत्रित कर लिया। इसके बाद श्रोताओं से सवालों की झड़ी लग गई और दोनों ने जीवन के रोचक अनुभव सुनाते हुए कुशलतापूर्वक उत्तर दिए।

सत्र में जोर दिया गया कि साहित्यिक पत्रिकाएँ मुख्य रूप से प्रिंट माध्यम पर आधारित होती हैं, लेकिन सफलता के लिए कंटेंट रोचक होना चाहिए। लघु पत्रिकाएँ कार्टून विधा को रोचक बनाने में रीढ़ की हड्डी साबित हो सकती हैं। 'जुरासिक पार्क' जैसे उदाहरण देकर दृश्यात्मक प्रस्तुति की शक्ति समझाई गई। कालजयी पात्र गढ़ने में कार्टून विधा की भूमिका पर चर्चा हुई और शंकर पिल्लई को भारतीय कार्टून जगत का पितामह बताया गया। स्वदेश (फूलबगिया) और वाजपेयी जी के संपादन कौशल का उल्लेख करते हुए व्यंग्य चित्रों के प्रयोग की चुनौती पर बात हुई।

यह सत्र केवल हास्य-परिहास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि साहित्य के गंभीर धरातल पर कार्टून और व्यंग्य की प्रासंगिकता को नए सिरे से स्थापित किया। डॉ. विकास दवे के कुशल संयोजन और डॉ. देवेंद्र शर्मा के प्रखर विचारों ने साहित्य प्रेमियों को नई दृष्टि प्रदान की।

तृतीय सत्र

संपादकों द्वारा अपनी पत्र-पत्रिकाओं का संक्षिप्त उल्लेख तथा प्रसार संख्या पर चर्चा। इस सत्र में इंदौर शहर एवं बाहर से पधारे संपादकों को अपनी बात रखने का अवसर मिला।उपस्थित संपादक गोपाल माहेश्वरी जी (देवपुत्र), नरेंद्र दीपक जी (पहला अंतरा), मनोज जी (समागम)संदीप 'सृजन' जी (अभिनव शब्द प्रवाह)राजेश रावल 'सुशील' (लोकभाषा की राष्ट्रीय पत्रिका संस्कृति संवाद) ने भागीदीरी करते हुए। अपनी पत्रिकाओं की जानकारी प्रस्तुत की। 

चतुर्थ सत्र

“कला और साहित्य का संगम” (साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में चित्रांकन का सौंदर्य) पर रहा, वक्ता सारंग क्षीरसागर जी एवं चर्चाकार सोनाली सिंह नरगुंदे जी (विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग) रही। 

सोनाली जी ने कला के सौंदर्यात्मक पक्ष को सामने रखा, जबकि सारंग जी ने तकनीक और अभ्यास के महत्व पर प्रकाश डाला। सारंग जी ने कहा कि चित्रकला केवल रंगों का मेल नहीं, बल्कि मौन शब्दों की एक सशक्त भाषा है।रेखाचित्र, छायांकन तथा विभिन्न माध्यमों (पेंसिल, वॉटरकलर आदि) के प्रयोग पर विस्तृत चर्चा हुई। मंच पर चित्रांकन की कृतियों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और प्रकृति के दृश्यों को जीवंत किया गया। डॉ. दवे जी के प्रश्न पर सारंग जी ने चित्रकार की अपेक्षा बताई -सबसे महत्वपूर्ण है समय सीमा के साथ उचित पारिश्रमिक।

पंचम सत्र

“अस्तित्व का संकट” (घटती प्रसार संख्या -एक वैश्विक चिंता : समाधान क्या?) पर केन्द्रित रहा। जिसमें वक्ता ईश्वर शर्मा जी एवं लोकेंद्र सिंह राजपूत जी रहे। 

ईश्वर शर्मा जी ने अपने चुटीले अंदाज में गंभीर बातों को सहजता से रखा। उन्होंने कहा कि AI पर कॉपीराइट्स जैसी कोई समस्या नहीं होती। तकनीक से डरने की जरूरत नहीं, बस उसे उपयोग करने का तरीका सीखना चाहिए ताकि काम आसान हो, हम खुद उसके जाल में न फँसें।

लोकेंद्र सिंह राजपूत जी ने बताया कि वे खुद हार्ड कॉपी पढ़ने में रुचि रखते हैं, किंतु समय के बदलाव के साथ हममें भी बदलाव होना चाहिए। मशीन या तकनीक हमारा उपयोग न करे, हम उसके उपयोग के साथ आगे बढ़ें।

इस सत्र के दौरान अतिथियों के करकमलों से जागृत मालवा पत्रिका का विमोचन हुआ। इसके बाद दो अतिरिक्त सत्र संपन्न हुए, जिनमें पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने अपने समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया।

द्वितीय दिवस

द्वितीय दिवस का शुभारंभ भी दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ।

प्रथम सत्र

“छपास की भूख”(प्रसिद्धि की लालसा के कारण साहित्य के गिरते स्तर और संपादकों द्वारा अपने मूल धर्म - नैतिकता एवं चयन की शुचिता - से विमुख होना) रहा। वक्ता डॉ शोभा जैन जी, सूर्यकांत नागर जी, शुभदा पांडे जी, प्रेम जन्मेजय जी, राहुल अवस्थी जी, संजीव सिन्हा जी रहे।

डॉ शोभा जैन जी ने रेखांकित किया कि आज की रचनाओं में मौलिकता लुप्त हो रही है। 'छपास की भूख' को मानवीय उत्कंठा के रूप में भी देखा जाना चाहिए। निराला और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान रचनाकारों के लिए 'छपास' सृजनात्मक संतोष का विषय था, जो आज मात्र संख्यात्मक वृद्धि तक सीमित रह गया है। उन्होंने 'सरस्वती' (1904) और महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन आदर्शों को मार्गदर्शक बताया। 'धर्मयुग' और धर्मवीर भारती (1980 में 5,07,000 प्रतियों का कीर्तिमान) का उदाहरण दिया। संपादकों पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने उन पर प्रहार किया जो साहित्य के स्तर को गिराकर महिलाओं के अंतरंग विषयों या सतही सामग्री को स्थान देते हैं। उन्होंने संपादकों को आत्म-अवलोकन की सलाह दी और रचनाकारों से पत्रिका की प्रकृति समझकर रचना भेजने तथा दर्जनों संपादकों को एक साथ रचना भेजने की प्रवृत्ति से बचने का आग्रह किया। एक सफल और धर्मनिष्ठ संपादक के लिए तीन अनिवार्य गुण: बहुश्रुत होना (व्यापक जानकारी और सुनने की क्षमता), बहुपठित होना (गहन अध्ययन और साहित्य की समझ), सृजकों से अधिक समृद्ध होना (बौद्धिक और भाषाई स्तर पर रचनाकार से श्रेष्ठ होना)। अंत में उन्होंने कहा कि यदि 'संपादकीय पन्ना' साहित्य का दर्पण है, तो उसे संप्रेषणीय और शुद्ध होना चाहिए। संपादकों को आपसी वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर साहित्य की गुणवत्ता और नियमितता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

डॉ प्रेम जनमेजय जी (व्यंग्य यात्रा) ने डॉ शोभा जैन के विचारों पर सहमति जताते हुए संपादन कला पर अपनी बेबाक राय रखी। उन्होंने कहा कि सभी संपादकों को एक कतार में खड़ा करना उचित नहीं। हर संपादक की अपनी दृष्टि होती है। 'छपास की भूख' को 'अभिव्यक्ति का अतिरेक' कहा। अच्छे संपादक का कार्य केवल रचना छापना नहीं, बल्कि अच्छे लेखक और जागरूक पाठक तैयार करना है। उन्होंने व्यंग्य की परंपरा पर कबीर, तुलसीदास के उदाहरण दिए और लेखकों में बढ़ती आत्ममुग्धता तथा सम्मान-लिप्सा पर चिंता व्यक्त की।

सूर्यकांत नागर जी (मनस्वी पत्रिका) ने कहा कि बड़े-बड़े साहित्यकार भी 'येन-केन-प्रकारेण' छपने की कोशिश में रहते हैं। नए लेखकों को इस भूख से बचना चाहिए। उन्होंने शरद जोशी और कमलेश्वर जी का संस्मरण साझा किया कि उन्होंने उनकी रचना पसंद न आने पर वापस लौटा दी थी — यह ईमानदारी का परिचायक है। उन्होंने लेखकों के लिए धैर्य को सबसे बड़ी पूंजी और जल्दबाजी को सबसे बड़ी कमजोरी बताया। संपादक को अहंकार से बाहर निकलकर व्यापक दृष्टि रखनी चाहिए। रचना अस्वीकार करने पर सुझाव देना चाहिए, सीधे मना नहीं करना चाहिए।

राहुल अवस्थी जी ने कहा कि संपादक को संबंधित विधा और विषय से पूरी तरह परिचित होना चाहिए। शुभदा पांडे, संजीव सिन्हा, राहुल अवस्थी, किशोर श्रीवास्तव जी आदि ने अपनी पत्रिकाओं के बारे में संक्षेप में बताया।

डॉ. विकास दवे जी ने पत्रिकाओं के आरएनआई पंजीयन, डाक पंजीयन, प्रेस सेवा पोर्टल पर प्रोफाइल बनाने आदि से जुड़ी जिज्ञासाओं का बिंदुवार समाधान बताया। इसके बाद एक विशेष सत्र और आयोजित किया गया जिसमें देश के कोने-कोने से पधारे संपादक बंधुओं को मंच से अपनी पत्र-पत्रिकाओं का संक्षिप्त परिचय देने का समान अवसर प्रदान किया गया।

उद्यापन सत्र

इस सत्र में मंचासीन रहे निरोगधाम पत्रिका के संपादक अशोक कुमार पांडे जी, डॉ. स्वाति तिवारी जी, संचालक अमन व्यास एवं डॉ. विकास दवे जी। सत्र का आरम्भ सुश्री सोनी सुगंधा के संपादक धर्म पर 'नमन मेरा शत-शत नमन है' गीत से हुआ। तत्पश्चात कांता राय जी एवं सुनीता प्रकाश जी की पत्रिका लघुकथा वृत्त का विमोचन हुआ।

साहित्य अकादमी की परंपरा के अनुसार उपस्थित सबसे वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर जी का मंच पर सम्मान किया गया। डॉ. स्वाति तिवारी जी ने सिहावलोकन प्रस्तुत किया। अशोक कुमार पांडे जी ने पाथेय प्रदान किया। अंत में डॉ. विकास दवे जी ने विदाई पाथेय दिया।


रिपोर्ट: वाणी जोशी, इंदौर

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