म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

भूख (लघुकथा) -डाॅ वाणी बरठाकुर 'विभा'


यमुना, रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म के नीचे एक झोपड़ी में रहती है, अपने दो बच्चे बबलू और मुन्नी के साथ। बबलू छः वर्षीय और मुन्नी दो साल की है। यमुना आस पड़ोस के घरों में काम करके दोनों बच्चों के संग जैसे - तैसे जीवन जी रही है ।

मुन्नी के रोने की आवाज से बबलू जाग गया । देखा कि वो माँ को जगा रही है , उसे भूख लगी है ।

बबलू ने भी माँ को जगाने की कोशिश की, मगर माँ का शरीर एकदम पत्थर जैसा हो गया है । हिल भी नहीं रहा है और ठंडा भी हो गया है । माँ को आज क्या हुआ ?

बबलू को भी मालूम नहीं । मुन्नी फिर बबलू को पकड़कर रोने लगी । तुतलाकर बोली कि उसे खाना चाहिए । बबलू समझ गया । अक्सर माँ जब काम पर जाती थी, उसे वो ही खाना खिलाता था । 

कई बार बबलू माँ को जगाने का प्रयास करने के बाद घर में देखा कि कहीं खाने की कुछ चीज मिल जाए । मगर सब बर्तन खाली पड़े हैं। बबलू एक कटोरा लिया और घर से निकल पड़ा।

स्टेशन पर कैंटीन के बाहर एक डस्टबिन रखा हुआ है.... वो सीधा डस्टबिन के पास गया । डस्टबिन के अंदर पड़े सामान को इधर- उधर करके देखा । एक प्लास्टिक की थैली में पका हुआ चावल और कई किस्म की खाने की चीजें हैं । उसको हँसी आ गई । बबलू उसे बर्तन में डालकर घर लाया और अपनी प्यारी बहन मुन्नी को खिलाने लगा । मुन्नी अब खुश है, शायद उसकी भूख अब मिट गई है । साथ में बबलू भी खाने लगा.......।

-डाॅ वाणी बरठाकुर 'विभा',तेजपुर असम


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