Subscribe Us

गांधी जी का पत्रकारिता संबंधी दृष्टिकोण -डॉ नीरज भारद्वाज


साहित्य के साथ-साथ समाचार पत्र भी समाज का दर्पण हैं,सही मायनों में यह दैनिक इतिहास लिखता है। समाज में जो कुछ हुआ है और जो हो रहा है, उसे वह बताने और जन तक पहुंचाने का पूरा प्रयास करता है। समाचारपत्र समाज के लिए हर छोटी-बड़ी बात को समझाने-दिखाने का भी प्रयास करता है। समाचारपत्रों को लेकर लोगों के अलग-अलग दृष्टिकोण और मत हैं। विचार करें और पत्रकारिता के इतिहास को पढ़े-समझें तो स्वतंत्रता से पूर्व की पत्रकारिता और स्वतंत्रता के बाद की पत्रकारिता में भी बहुत बड़ा अंतर आया है। पहले प्रिंट मीडिया और फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पत्रकारिता को नए-नए आयाम दिए हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से अब इंटरनेट मीडिया का यह दौर हमें दिखाई भी दे रहा है। यह सब समय की मांग है और समय परिवर्तन होने के साथ-साथ पत्रकारिता में भी बड़ा परिवर्तन आ रहा है।

यह सब युग की मांग कहें या बदलते मीडिया साधनों का प्रभाव कहें, जो भी है, ठीक ही है। स्वतंत्रता पूर्व की पत्रकारिता को जब हम पढ़ते हैं तो हम स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े जननायक महात्मा गांधी जी का नाम पढ़ते-जानते हैं। इसके साथ ही हम गांधी जी का नाम पत्रकारिता के दृष्टिकोण से भी जान-समझ सकते हैं। समाचारपत्रों के बारे में गांधीजी लिखते हैं कि सत्य की विजय के लिए समाचारपत्र ही अनिवार्य साधन हैं। ऐसी कोई भी लड़ाई जिसका आधार आत्मबल हो, समाचारपत्रों की सहायता के बिना नहीं चलाई जा सकती। अहिंसक उपायोंसे सत्य की विजय के लिए समाचारपत्र एक महत्वपूर्ण और अनिवार्य साधन हैं।समाचारपत्रों के प्रति गांधी जी के यह विचार बहुत ही महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता से पूर्व और आज भी समाचारपत्र तथा पत्रकारिता दोनों ही समाज के लिए महत्वपूर्ण अंग हैं। यह जन जागृति का काम करतें हैं।

हर छोटी बड़ी बात को समाज के हर अंग तक पहुंचाने का काम पत्रकारिता ही करती है। हिंद स्वराज के पहले ही अध्याय में गांधीजी लिखते हैं कि अखबार का एक काम तो है लोगों की भावनाएं जानना और उन्हें जाहिर करना, दूसरा काम है लोगों में अमुक जरूरी भावनाएं पैदा करना और तीसरा काम है लोगों में दोष हों तो चाहे जितनी मुसीबतें आने पर भी बेधड़क होकर उन्हें दिखाना। गांधी जी के जीवन को जब हम पढ़ते-देखते हैं तो हम पाते हैं कि गांधी जी एक सफल पत्रकार भी रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेजी शासन के विरुद्ध गांधी जी ने जन आंदोलन के साथ ही समाचारपत्रों में लेख लिखें और समाचारपत्रों का संपादन भी किया। जिससे कि ब्रिटिश सरकार की नींद उड़ गई थी। जब वह 19 वर्ष के थे तब उन्होंने स्वतंत्र लेखन के रूप में पत्रकारिता में प्रवेश किया और दैनिक टेलीग्राफ तथा टेली न्यूज़ आदि पत्रों में भारत के विषय में लिखा। भारतीयों के साथ भेदभाव पर प्रकाश डालने के लिए टाइम्स आफ इंडिया, हिंदू, अमृत बाजार पत्रिका आदि पत्रों में लेख भेजे।

गांधी जी लिखते हैं कि, यदि मैं अपनी आस्था के प्रति कर्तव्यनिष्ठ हूं तो क्रोध में आकर या द्वेष से कुछ नहीं लिखूंगा। मैं बिना किसी प्रयोजन के भी नहीं लिखूंगा। मैं यह नहीं चाहूंगा कि लिखते समय मैं केवल भावनाओं में बह जाऊं। पाठकों को क्या मालूम कि हर सप्ताह अपना विषय चुनने में शब्दों के इस्तेमाल में मुझे अपने पर कितना नियंत्रण रखना पड़ता है।यह वास्तविक सत्य है। जब कोई लेखक या पत्रकारिता में पत्रकार लिखता है तो वह शब्दों के साथ कितनी लड़ाई लड़ता है। किस शब्द को कब, कहां, किस स्थिति में प्रयोग करना है, यह उसके मस्तिष्क में चलता ही रहता है।

31 मई,1924 में मतवाला पत्र ने लिखा कि, यदि आप स्वतंत्रता के अभिलाषी हैं, अपने देश में स्वराज की प्रतिष्ठा चाहते हैं तो तन-मन और धन से अपने नेता महात्मा गांधी के आदेश का पालन करना आरंभ कर दीजिए। समाचारपत्रों से देश में जन जागृति और राष्ट्र प्रेम की भावना जगी, इसमें कोई दो राय ही नहीं है। गांधी जी ने स्वतंत्रता संग्राम के समय यंग इंडिया, नवजीवन हिंदी, हरिजन आदि कई समाचारपत्र निकाले और ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों का खुलकर विरोध किया। गांधीजी केवल देश की आवाज नहीं, बल्कि वह विश्व जन समुदाय के लिए बहुत बड़े प्रेरणा स्रोत रहे हैं। आप समाज जीवन से किसी भी क्षेत्र की बात करें उसमें गांधी जी के विचार अपने आप ही ठीक बैठते चले जायेंगे। ऐसे युग पुरूष को शत् शत् प्रणाम।
-डॉ. नीरज भारद्वाज
(युवराज फीचर)

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ