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नारी-नारायणी


शास्त्र साक्षी है, नारी को सदैव नारायणी के रूप में ही देखा है। नारी को अपने गुणों के कारण ही लक्ष्मी, सरस्वती एवं दुर्गा के रूप में जाना जाता है तथा पुरूष की सफलता का राज एक नारी ही है जो शक्ति का प्रतीक माना जाता है। चाणक्य ने तो यहां तक कहा है “नारी में लाज का भाव पुरूषों से चार गुणा और साहस छः गुणा ज्यादा होता है तथा नारी का धैर्य धरा के समान होता है। इसलिए देवता भी नारी नारायणी को वन्दन नमन करते है। ब्रह्मा अपनी शक्ति सरस्वती के साथ जुड़ कर संसार का सृजन करते है। विष्णु अपनी शक्ति महा लक्ष्मी के साथ जुड़ कर संसार का संचालन करते है तथा शिव अपनी रोद्रशक्ति दुर्गा या महाकाली के साथ जुड़कर संसार का विध्न हरते हैं।

लाखों साल के इतिहास में मानव नस्ल का प्रजनन संस्कार, परिवारनिर्माण, पोषण और संस्कृति की रचना करना नारी का मुख्य दायित्व रहा है फिर भी शुष्क व्यवहार और उपेक्षा की मार को झेलते हुए नारी ने अपने सौन्दर्य और सहजता को खूब सूरती के साथ बचाये और बनाये रखा है। उसने कुछ न मांग कर, कुछ न चाह कर महज खुशी, सेवा, साथ और भरोसा दिया है। सम्पूर्ण जीवन को समर्पित भाव के कारण नारी नारायणी बनी है, क्योंकि नारी जीवन है, शक्ति है, संबल है। इतना ही नहीं नारी निर्माण की अभिव्यक्ति है। नारी एक जीवन को जीवन दान है तथा दुनिया को दिखाने का अहसास भी। नारी इस संसार की ठोस सच्चाई है।

नारी नारायणी इस लिए भी है उसमें हौसला है जमाने को बदलने का! इरादा है हर खालीपन को खुशियों से भरने का! तथा उम्मीदें है बहुआयामी पंखों से लम्बी उड़ान भरने का। ऐसा अद्भुद् नजारा जहां नारी एक दूसरे का हाथ थाम कर संसार में हर असम्भव को सम्भव बना रही है नारी तो एक छायादार वृक्ष की तरह है जिसकी छाया तले पुरूष अपनी समस्त व्यथा को भूल जाता है। नारी कोमलता पवित्रता, मधुरता आदि दिव्य गुणों की प्रतिमूर्ती है। नारी ब्रह्म विद्या है, श्रद्धा है, काम धेनू है, अन्नपूर्णा है तथा सिद्धि है। सीता सावित्री, गार्गी, मैत्रैयी, ब्राह्मी, सुन्दरी जैसी महान नारियों ने इसदेश को अलंकृत किया हैं।

पुरातन काल में नारियों को राजनीति, सामाजिक, धार्मिक कार्यों में उच्च स्थान प्राप्त था। पत्नी के बिना धार्मिक कार्य सम्पन्न नहीं होते थे। देवासुर संग्राम में कैकयी ने अपने अद्वितीय रण कौशल से राजा दशरथ को चकित कर दिया। याज्ञवलक्य की सह धर्मिणी ने अध्यात्मिक धन के समक्ष संसार धन तुच्छ सिद्ध कर दिया। सावित्री ने अपने सतित्व के बल पर पति को यमराज के हाथों से छुड़ा दिया। विद्वमता ने कालिदास जी को प्रकाण्ड पण्डित तथा तुलसीदासजी आध्यात्मिक बनाने वाली नारी ही थी। जीजा बाई की शिक्षा दीक्षा ने शिवाजी को महान देशभक्त बना दिया तथा पन्नाधाय ने तो अपने पुत्र का बलिदान देकर इतिहास को स्वर्णिम बना दिया। रानी लक्ष्मीबाई रजिया सुलतान पदमनी और मीरा के शौर्य, जौहर और भक्ति ने मध्यकाल की विकट परिस्थितियों में भी अपनी सुकीर्ति का झण्डा फहराया। इस प्रकार स्पष्ट है नारी नारायणी पुराण की देवी, वैदिक काल की विदुषी, मध्यम काल की वीरांगना और वर्तमान काल की समर्थ नारी ने सभी क्षेत्रों में स्वयं को सिद्ध किया है। इतना ही नहीं नारी शक्ति है, नारी भक्ति है, नारी सम्मान है, गौरव है, हमारा अभिमान है। इसलिए वह समानता एवं सम्मान की अधिकारी भी है। आज नारी का सम्मान कहां जा रहा है जिसका वह हित सोचती है वही छल करता है, शोषण करता है, लज्जा से खिलवाड़ करता है।

अतः हे आत्म जनों आपको इतने सुख, आत्मीयता, प्रेम वात्सल्य एवं त्याग भावना से सर्वस न्योछावर करने वाली नारी को इनके सम्मान एवं आदर से वंचित न करें क्योंकि नारी नारायणी का अपमान भगवान की श्रेष्ठ कृति का अपमान है।

-पदमचंद गांधी, भोपाल

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