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मोक्ष (लघुकथा)


अपने बेटे की मुक्ति के लिए मां तीन साल से प्रतीक्षा कर रही थी। उसका बेटा तीन साल पहलै एक एक्सीडेंट में चल बसा था। एक्सीडेंट में हुई मौत का सद़मा वह झेल नहीं पाई थी।जवान बेटे की मौत ने उसे पूरी तरह से तोड़ दिया था। वृद्धावस्था में जबकि उसे एकमात्र अपने- बेटे का सहारा था। वह सहारा ही उसका चला गया था। विधाता ने उसके साथ कितना बड़ा अन्याय किया था यह वह दुखीयारी ही जानती थी। रही सही कस़र उसकी विधवा बहू ने पूरी करदी थी। उसे प्रापर्टी में हिस्सा लेना था, इसलिए उसने कोर्ट में अपने- हक के लिए मुकद़मा लगा दिया था। मकान उस मां के नाम से था, जिस पर बहू अपना ह़क ज़ता रही थी।

इस दोहरे अन्याय से बूढ़ी मां जूझ रही थी। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी थी। वह मुकदमा लड़ रही थी, क्योंकि उसे अच्छी तरह पता था कि यदि बहू को उसका मकान मिल गया तो वह उसे घर के बाहर निकाल देगी और उसे भिखारी बना देगी। इसलिए वह अपने ह़क की प्रापर्टी को किसी भी हालत में बहू को देने के पक्ष में नहीं थी।

इधर बेटे की मौत के तीन साल बाद उसका गयाजी में पिंडदान करना था, इसलिए उसने अपने क्षमतानुसार गयाजी जाकर अपने बेटे का श्रद्धापूर्वक पिंडदान किया और अपने आंसुओं से उसका उसकी मुक्ति की कामना परमपिता से की। मनुष्य इसके आगे और कर भी क्या सकता है। अपने- वृद्ध शरीर को जो कि अनेक तरह की बीमारियों से ग्रसित होनू के बावजूद यह सब कार्य उसने अकेले ही अपने द़म ख़म पर किया और अपने घर लौट आई।

कोर्ट में पेशी होती रही। बहू ने अपनी स्थिति बताई और उसके बयान हुए। फिर बूढ़ी मां के बयान हुए। उसने अपने मकान की रजिस्ट्री की नकल पेश की। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद कोर्ट ने जो निर्णय सुनाया वह बूढ़ी मां के पक्ष में था, लेकिन बहू को यह आदेश दिया कि वह अपनी बूढ़ी सास के साथ रह सकती है। जब तक बूढ़ी सास जीवित है तब तक उस मकान में रह सकती है। बूढ़ी सास के जीवित न रहने के पश्चात वह उस मकान की मालकिन बन सकेगी।

इस आदेश से बूढ़ी मां को बहुत बड़ा सम्बल मिल गया। वह बहू को अपने साथ पहले भी रखती आई थी ओर अब भी रखने को तैयार थी। इस आदेश के बाद बहू हो मज़बूरी में कोर्ट का आदेश मानना था। वह अपनी बूढ़ी सास के साथ रहने लगी। इस आशा में कि बुढ़िया कभी न कभी तो मरेगी ही।

-डॉ रमेशचन्द्र, इंदौर

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