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वैश्विक स्तर पर हिंदी का बढ़ता प्रभाव


हाल ही में दिल्ली में संपन्न जी-20 सम्मेलन में वैश्विक मीडिया ने एक विशेष बात देखी कि कार्यक्रम के ' लोगो' के साथ इंडिया से पहले देश का नाम हिंदी में ' भारत' लिखा गया । करीब 20 देशो के राष्ट्र अध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों ने इस विशेषता को पहली बार देखा। निश्चित रूप से इस घटना ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। हिंदी का मान बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए। इससे स्पष्ट है कि वैश्विक स्तर पर हिंदी का प्रभाव बढ़ रहा है।

यह सत्य है कि किसी राष्ट्र को मजबूत बनाने के लिए वहां की सांस्कृतिक विशिष्टता की विशेष भूमिका होती है और इसका आधार उस देश की अपनी भाषा होती है। राष्ट्रीय भाषा के बिना किसी राष्ट्र के अस्तित्व की कल्पना करना ही असंभव है। राष्ट्र की एकता के लिए जरूरी है सांस्कृतिक विशिष्टता और राष्ट्रीय भाषा। इस महत्व को समझते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 सितंबर 2015 को भोपाल मध्यप्रदेश में विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन किया। यह गरिमामय सम्मेलन तीन दिन तक चला।

इस सम्मेलन में भारत सहित 27 देश के करीब 2000 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। देश-विदेश के हिंदी विचारको और साहित्य मनीषियों ने विभिन्न विषयों पर अपने विचारों को साझा किया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उनके अनेक मंत्री, अधिकारी इस आयोजन की तैयारी में स्वयं जुटे रहे। पूरे शहर को सजाकर तब हिंदीमय बना दिया गया। उस समय राजभाषा हिंदी का प्रचार प्रसार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संभव हो सका। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी अनेक भाषण हिंदी में दिए। प्रधानमंत्री मोदी भी देश-विदेश में अधिकांश भाषण हिंदी में देते हैं। मातृभाषा के प्रति उनका यह आदर और समर्पण की भावना को दर्शाता है। उनके अधिकांश भाषण हिंदी में होते हैं। इससे हिंदी का उत्तरोत्तर प्रभाव बढ़ रहा है और देश विदेश में स्वीकार्यता भी बढ़ रही है। यह देश के लिए गौरव की बात है।

भारतीय संविधान में धारा 343 द्वारा यह घोषित किया गया है कि संविधान पारित होने के 15 वर्ष पश्चात हिंदी सरकारी कामकाज की भाषा होगी और अंग्रेजी जिन कार्यों के लिए व्यवहार में आती रही है, वह 15 वर्षों तक आती रहेगी । वर्ष 1963 में संसद में एक राजभाषा अधिनियम बनाया, जिसमें तय किया कि कुछ काम हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में साथ-साथ किए जाएंगे। तमिलनाडु में वर्ष 1965 में हिंदी को राजभाषा बनाने का विरोध और आंदोलन हुआ। इसके बाद संसद में कुछ संकल्प पारित हुए और कहा गया कि केंद्रीय सरकार और हिंदी भाषी राज्यों के बीच पत्र व्यवहार में अंग्रेजी का प्रयोग तब तक चलता रहेगा, जब तक हिंदी भाषी राज्य स्वयं हिंदी में व्यवहार करने का निर्णय न ले लें। इन घटनाओं के बाद हम देख रहे हैं कि केंद्र और राज्य सरकारों में नौकरशाहों ने कामकाज की भाषा में अंग्रेजी को अधिक महत्व दिया।

शासकीय पत्र व्यवहार में भी अंग्रेजी प्रेम की मानसिकता से वे उबर नहीं सके। विश्वविद्यालय , महाविद्यालय और स्कूलों में भी अंग्रेजी को अधिक महत्व दिया जाता रहा है । न्यायालय एवं तथा अन्य शासकीय संस्थाओं में अंग्रेजी का बोलबाला रहा। अंग्रेजों ने जब यह भाषाई बीज बोया तब देश परतंत्र था, लेकिन स्वतंत्र होने के बाद हिंदी को जो प्रतिष्ठा मिलना चाहिए थी, वह नहीं मिल सकी, जबकि वह इसकी अधिकारी है। इसके लिए वे लोग जिम्मेदार हैं जो अंग्रेजी की दासता की मानसिकता से अभी तक उबर नहीं सके हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने हिंदी के विकास के लिए अनेक प्रयास किए हैं। नई शिक्षा नीति में हिन्दी को महत्त्व दिया गया है। केंद्र और राज्य सरकारों के पत्राचारों में हिंदी का प्रचलन बढ़ा है। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी का प्रयोग अपेक्षाकृत बढा है। शिक्षा के क्षेत्र में भी अब हिंदी को बढ़ावा दिया जा रहा है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिंदी का बढ़ता प्रभाव देखा जा सकता है। पिछले 9 वर्षों में हिंदी में उत्तरोत्तर विकास की यात्रा जारी है और आशा है आगे भी सतत रूप से चलती रहेगी।

अहिंदी भाषी राज्यों में क्षेत्रीय भाषाओं के साथ-साथ हमें हिंदी के प्रचलन को बढ़ाना होगा। वहां के नागरिकों में हिंदी को दोयम दर्जे की भाषा मानने की मानसिकता से उन्हें बाहर लाना होगा। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और पूर्व से पश्चिम तक भारत अखंड राष्ट्र है। देश की अखंडता के लिए आवश्यक है कि हम हिंदी के सभी राज्यों में स्वीकार्यता को बढ़ाने के ठोस प्रयास करें ।

राष्ट्रीय पर्वों और सांस्कृतिक आयोजनों में हम देखते हैं कि सभी राज्यों की झांकियां प्रदर्शित की जाती हैं । सभी राज्यों के कलाकार अपनी-अपनी क्षेत्रीय परिधानों में और बोलियो में कला का प्रदर्शन करते हैं। फिल्म और टेलीविजन के माध्यम से भी हिंदी का प्रयोग निरंतर बढ़ा है तथा इसे और बढ़ाने की जरूरत है। हमारी संस्कृति, राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए हिंदी का विकास जरूरी है। उम्मीद है वैश्विक स्तर पर हिंदी के बढ़ते प्रभाव की यह यात्रा आगे भी जारी रहेगी।
-श्रीराम माहेश्वरी भोपाल
( लेखक साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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