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जगतगुरु संत रविदास


15 वीं शताब्दी के संत शिरोमणि रविदास महान संत, दर्शनशास्त्री, कवि, समाज सुधारक, उन चुनिंदा महापुरुषों में से एक हैं जिन्होंने अपने रूहानी वचनों से संसार को एकता और भाईचारे से बांधा। लोगों की नज़र में सामाजिक और आध्यात्मिक ज़रूरतों को पूरा करने वाले मसीहा थे, जिनकी अनूप महिमा देखकर की राजे और रानियां भक्ति मार्ग से जुड़ने के लिए इनकी शरण में आए।


ये जीवन भर समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ लड़ते रहे। इन्हें सतगुरु और जगतगुरु के नाम से नवाजा गया। ये मीरा बाई के गुरु भी कहाए गए। इन्हें रैदास के नाम से भी जाना जाता है। चर्मकार कुल से होने के कारण जूते बनाने का पैतृक व्यवसाय अपनाया और पूरी लगन और मेहनत से किया।
माघ मास की पूर्णिमा पर इनकी ज्यन्ती मनाई जाती है। 


रैदास जी बचपन से ही दयालु और परोपकारी स्वभाव के थे। दूसरों की सहायता, प्रभु सिमरन, और संत सेवा में इन्हें आनन्द मिलता था‌। एक बार इनके पड़ोस के कुछ लोग गंगा स्नान को जा रहे थे, और इनसे भी चलने का आग्रह किया तो रैदास जी ने जाने से इसलिए। इन्कार कर दिया क्योंकि उन्हें किसी को उसी दिन जूते बना कर देने का वचन दिया था और वो वचन भंग नहीं कर सकते। उनके अनुसार वचन भंग होने पर पुण्य कैसे प्राप्त हो सकता है। इसी तरह और भी किस्सा ये जुड़ा है इनसे कि एक समय रैदास जी अपनी कुटिया में प्रभु सिमरन कर रहे थे तो एक ब्राह्मण आया और बोला कि वह गंगा स्नान के लिए जा रहा था और सोचा रास्ते में आपके दर्शन करता चलूं, उसकी बात सुनकर रैदास जी ने अपनी कठौती में से एक सिक्का निकाला और देते हुए बोले कि गंगा स्नान को जा रहे हो यह एक मुद्रा है गंगा जी को मेरी तरफ से दे देना।


जब स्नान कै बाद ब्राह्मण वह मुद्रा गंगा में डालने को उद्धत हुआ तो गंगा के जल में से स्वयं गंगा मैया ने हाथ निकाल कर वो मुद्रा ली और एक सोने का कंगन ब्राह्मण को दिया। ब्राह्मण कंगन लेकर लौट रहा था तो नगर के राजा से मिलने गया और ब्राह्मण ने सोचा क्यों ना यह कंगन राजा को भेंट करूं तो राजा खुश होगा। उसने कंगन राजा को भेंट किया, राजा बहुत खुश हुआ और बहुत सी मुद्राएं उसकी झोली में डाल दी। राजा ने कंगन अपनी रानी को दिया। 


रानी को कंगन इतना भाया कि उसने ऐसा ही दूसरा कंगन लाने की इच्छा व्यक्त की। राजा ने ब्राह्मण को बुला कर दूसरा कंगन तीन दिन में लाने को कहा। ब्राह्मण चिंता में पड़ गया कि दूसरा कंगन कहां से लाए। इसी चिंता में डूबा ब्राह्मण रैदास जी के पास गया और सारा वृत्तांत सुनाया और बोला कि यदि तीन दिन में कंगन नहीं दिया तो राजा उसे दंड देगा। ये सुनकर रैदास जी ने कठौती ली जिसमें चर्म गलाते थे, गंगा जी का आव्हान किया और जल छिड़का तब गंगा मैया प्रकट हुई, और रैदास जी के आग्रह पर दूसरा कंगन ब्राह्मण को दिया, ब्राह्मण राजा को वो कंगन भेंट करने चला गया और रैदास जी ने अपने बड़प्पन का ज़रा भी एहसास ब्राह्मण को होने नहीं दिया। रैदास जी के ऐसे व्यवहारों के बाद ही यह कहावत प्रचलित हुई, #मन चंगा तो कठौती में गंगा# उनकी इस कहावत से और भी कथाएं जुड़ी हुई हैं ।


रैदास जी को बचपन से ही आलोकिक शक्तियां प्राप्त थी । कहते हैं एक बार रैदास जी अपने साथी के साथ खेल रहे थे कि अगले दिन उनका साथी खेलने नहीं आया, रैदास जी को पता कि उसकी मृत्यु हो गई तो उन्हें बहुत दुःख हुआ और अपने मित्र के पास जाकर बोले कि उठो ये कोई सोने का समय है, ये तो खेलने का समय है। इतना सुनकर उनका मृत साथी उठ खड़ा होता है। उन्होंने अपनी शक्ति को भक्ति में लगाया और संत बन गए।


रैदास जी एक महान कवि भी थे उनकी कविताएं आज के जीवन में अमुल्य सीख देती हैं।
जैसे कि इनके कहें अनुसार- ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीन अर्थात जिस ब्राह्मण में ब्राह्मण के गुण ही ना हो वो ब्राह्मण कैसा?


रविदास जन्म के कारनै होत ना कोऊ नीच अर्थात कोई भी जन्म से छोटा या बड़ा नही होता, व्यक्ति अपने कर्म से छोटा या बड़ा होता है इसलिए हमें हमेशा कर्म करते रहना चाहिए। इसी तरह से उनकी कविताओं से अच्छी सीख मिलती है। इनके लगभग 40 शब्द गुरु ग्रंथ साहब में भी दर्ज हैं।


आने वाली माघ पूर्णिमा 27 फरवरी को भक्तों के लिए यह दिन किसी त्यौहार से कम नहीं, इस दिन रैदास जी का जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, भक्त पवित्र नदी में स्नान करते हैं और रैदास के लिखे भजन अथवा कविताएं गान के रूप में गाते हैं। उनकी शिक्षाएं आज भी प्रेरणा दायक हैं। उनके द्वारा कहे शब्द, पद, दोहे और अनमोल वचन सदैव आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करते हैं ‌।


प्रेम बजाज

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