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युग की काया


गीतिका पटेल 'गीत'

जाने कैसा युग है आया
हर तरफ माया की काया।
मोह में रहकर कर लिया प्रेम
मोह जो टूटा तो सब टूटे भ्रम।

जाने क्या क्या दिन दिखलायेगा
और किस किसको सत्य समझायेगा।
अपनी मनमानी करते करते तुम
हो न जाना कहीं काले अंधियारे में गुम।

कब तक स्वार्थ की भावना लेकर
जीवन अपना झूठे साए में जीते रहोगे।
कभी तो खुलकर अपनाओ समाज को
और समाज में अपना अस्तित्व बनाओ।

रहो न इस मतलबी युग का साया
बनाओ अपनी एक अलग सी काया।
कलयुग नहीं मतलबी युग चल रहा है
इस योग में अपनी अलग पहचान बनाओ ज़रा।

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