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मनोमस्तिष्क में गहरी पैठ बनाते हैं कवयित्री वीणा के वर्ण-पिरामिड

कृति- अनुभूति के पुष्प (वर्ण-पिरामिड)
कृतिकार- वीणा शर्मा वशिष्ठ
प्रकाशक- अनीता पब्लिशिंग हाउस, गाजियाबाद
मूल्य- ₹ 200
पृष्ठ- 112
हिन्दी कवि प्रारम्भ से ही प्रयोगधर्मी रहा है और हिन्दी कविता ने समय-समय पर अन्य भाषाओं की विधाओं को भी स्वयं में आत्मसात् किया है। ग़ज़ल, हाइकु, ताँका, चोका, सेदोका आदि विदेशी काव्य-विधाओं को आत्मसात् करने के साथ ही साथ हिन्दी कविता ने कविता की पिरामिड विधा को भी स्वयं में आत्मसात् किया। कालान्तर में पिरामिड कविता-लेखन में हिन्दी के कवियों ने रुचि दिखायी, परिणामस्वरूप पिरामिड कविता की उपस्थिति सोशल मीडिया से लेकर पत्र-पत्रिकाओं में दिखने लगी। यों तो अंग्रेज़ी साहित्य में पिरामिड कविता पहले से लिखी जा रही है, और वहाँ पर पिरामिड कविता के कई फॉर्मेट प्रचलित हैं, जो शब्द, वर्ण या सिलेबुल्स के आधार पर बने हैं। हिन्दी कविता में वर्ण-पिरामिड अधिक लोकप्रिय है। यह प्रसन्नता की बात है कि हाल ही में कवयित्री सुश्री वीणा शर्मा वशिष्ठ जी का 'वर्ण-पिरामिड' कविता का संग्रह 'अनुभूति के पुष्प' नाम से प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह के अन्तर्गत 'वर्ण-पिरामिड' कविता के जिस स्वरूप में लेखन वीणा जी ने किया है, यह कुल 28 वर्णों की कविता है जो बढ़ते हुए क्रम में 7 पंक्तियों में 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 (प्रत्येक पंक्ति की वर्ण/अक्षर गणना) में लिखी जाती है। पिरामिड कविता के इस शिल्प 'वर्ण-पिरामिड' को प्रचलन में लाने और लोकप्रिय बनाने का श्रेय वरिष्ठ कवि सुरेश पाल वर्मा 'जसाला' जी को है।


कवयित्री सुश्री वशिष्ठ जी ने 'वर्ण-पिरामिड' लघुविधा के माध्यम से अपने मन की सहज अभिव्यक्ति को रूपाकार किया है। विविध विषयों को उन्होंने अपनी लेखनी का पिरोया है। विषय-वस्तु की विविधता किसी भी विधा के सम्यक प्रसार में सहायक होती है। दो अलग-अलग भाव के वर्ण-पिरामिड देखें, जहाँ अभिव्यक्ति पाठक के लिए स्पष्ट संदेश संप्रेषित करती है, यहीं पर आकर लेखन उद्देश्यपूर्ण हो जाता है। यही रचनाकार की सफलता है-
"हो
जन्म
सफल
मनमीत
सुर संगीत
संबंधों की जीत
सीता-राम-सी प्रीत।"
*

"हाँ
गुम
चिरैया
वृक्ष घटे
नीड़ भी हटे
चीं रूदन भारी
विलुप्तता है जारी।"


साहित्य में वर्तमान युग लघुविधाओं का है। आज की दौड़-भाग की दिनचर्या में समय का अभाव लघुविधाओं के प्रसार में सहायक भी है। कम शब्दों में बड़ी बात और पाठक के मस्तिष्क में दीर्घ काल तक अपना स्थान सुरक्षित रखने की क्षमता लघुविधाओं की बड़ी विशेषता है। इस दृष्टिकोण से भी वर्ण-पिरामिड जैसी लघु विधा का महत्व बढ़ जाता है-
"हाँ
बेटी
पतंग
पा के संग
रंगीन स्वप्न
हौसले से उड़ी
नव उड़ान भरी।"


रचनाकार अपने समय का स्पष्ट दर्शक होता है। वह घटनाओं को देखता है, परखता है और उनमें व्याप्त विसंगतिया, जब झकझोरती हैं, तो कविता ढल जाती है। ऐसे में विभिन्न विधाओं में शानदार लेखन कार्य कर रहीं वीणा जी की संवेदना 'वर्ण-पिरामिड' में ढल जाती है-
"न
रार
झिड़की
रोती कक्की
खुली खिड़की
आह हृदय शून्य
चाहे पुत्र से पुण्य।"


इस संग्रह को शर्मा जी ने अपने पिताश्री को समर्पित किया है। उनकी स्मृतियाँ और किया गया पथ-प्रदर्शन उन्हें संबल प्रदान करते हैं। एक पिता द्वारा अपनी संतान के कंधे पर रखा गया हाथ दुनिया का सबसे बड़ा संबल होता है। पिता को परिभाषित करते हुए उन्होंने एक वर्ण-पिरामिड में लिखा है-
"हाँ
पिता
कर्मठ
दिव्य धाम
जीवन स्तम्भ
चरण विहान
अद्भुत तीर्थस्थान।"


वे विद्रूपताओं का पर्दाफाश करती हैं। उनके वर्ण-पिरामिडों में चिन्तन की गम्भीरता परिलक्षित है-
"ये
नेह
मकान
झूठी शान
रिश्ते दूकान
अदृश्य हैं गाँधी
उड़ी स्वार्थ की आँधी।"


लघु विधाओं में लेखन कार्य करना असिधार में चलने जैसा है या फिर यह उस 20-20 क्रिकेट की भाँति है, जहाँ एक चूक आप के मैच का परिणाम बदल सकती है। इस दृष्टि से अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता रहती है। कवयित्री वीणा जी अपने संग्रह 'अनुभूति के पुष्प' के माध्यम से इस चुनौती को स्वीकार करती हैं और अपनी सजग रचनाधर्मिता के माध्यम से पाठक के मनोमस्तिष्क में गहरी पैठ बनाती हैं। मुझे विश्वास है कि वे अपने रचनाकर्म से हिन्दी कविता की इस विधा 'वर्ण-पिरामिड' को यश प्रदान करेंगी। एक विशेष संग्रह के लिए उन्हें हृदय से बधाई।


समीक्षक -डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

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