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जाने क्या सोचे विधाता

मीरा सिंह 'मीरा'
जाने क्या सोचे विधाता
कैसा कैसा खेल रचाता।
पत्थर को मोम बनाता
सहरा में फूल खिलाता।

आंखों में जुगनू चमकाता
सोए अरमानो को जगाता।
रूप धर कर बादलों का
अवनि की प्यास बुझाता ।।
कैसा कैसा- ------

कान्हा बन मुरली बजाता
इशारे पर सबको नचाता
कभी हंसाता कभी रूलाता
मन अपना है बहलाता।
कैसा कैसा----

नित सबेरे सूरज है आता
दिन ढलते ही डूब जाता ।
यह दुनिया है एक सराय
सारे जग को है समझाता।।
कैसा कैसा----

समय का पंछी उड़ता जाता
हाथ किसी के नहीं है आता।
वक्त के साथ तू भी चलना
हरदम कहता है विधाता।।

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