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नागार्जुन: जीवन राग के कवि (शोध-पत्र)

डॉ माया दुबे
साहित्य का जीवन से अन्योन्याश्रित सम्बंध है, कवि समाज में ही पलता-बढ़ता है, सामाजिक चेतना से उसका सम्पूर्ण जीवन सराबोर होता है| जीवन राग उसकी कविताओं में व्याप्त होता है| कबीर, रहीम, तुलसी सभी ने अपनी सामाजिक चेतना का अपनी लेखनी से उकेरा है| तत्कालीन समाज का कच्चा चिठ्ठा कवि अपनी लेखनी से लिखता है| वही कवि श्रेष्ठ है, जो लोक चेतना का संवाहक है, जन-जन के मनोभावों का प्रतिनिधित्व करे| समाज में फ़ैली कुरुतियों, रुढियों को प्रकट कर पाठक की आँखें खोले| ‘कवि एक: प्रजापति’ भले ही कहा गया है, लेकिन उसकी कल्पना में सिर्फ प्रेम या श्रृंगार नहीं है, करुणा भी है, व्यंग्य भी है, हास्य भी है| नागार्जुन ने एक साक्षात्कार में स्वयं कह है “ हमारा खेती में मन नहीं| गाँव जाते रहते हैं| लेकिन एक वह जो लगातार निरंतर गृहजीवन है, वह हमारा हुआ नहीं| कभी ये, कभी ये, कभी वो इसमें पचास झंझट है| हमारी घुमक्कड़ी की पचासों ललक है| घुमक्कड़ होने का यह मतलब नहीं कि हम घरेलू आदमी नहीं है|” (1)

अर्थात कवि की दृष्टि में घुमक्कड़ी एक विशिष्टता है, जीवन-राग, लोक से जुड़ने का, लोक को नजदीक से जानने का| घर तो लौटना ही है, यायावर है एक कवि तो वह नितांत घरेलू भी है| यहीं जीवन की जीवन्तता है, कवि का वैशिष्ट्य है|


नागार्जुन के व्यक्तित्व में कवि निराला का अखंडपन तथा विविधता है| कृषक की पीड़ा भी समझते हैं, गरीबी का दर्द भी महसूस करते हैं तो काव्य के विविध शैलियों का भी निरूपण करते हैं| बहुत तरह के छंद एवं कथ्य शैलियों का प्रयोग नागार्जुन ने अपनी कविता में किया है| काव्य को चमकृत रूप देने वाले अद्वितीय कवि हैं| गद्य तथा पद्य दोनों में कवी की अद्भुत पकड़ है| वाग्मिता में भी उतने ही विलक्षण हैं| नागार्जुन के कविता के शिल्प ने इस महादेश के विराट भूगोल, उसकी सामाजिक विविधताओं और विस्मयकारी प्रकृति से जोड़ा है| बातों में सहज संप्रेषणीयता है, यहीं कवि की सबसे बड़ी विशेषता है, जो बातों को पाठक के मन तक यथावत पहुंचा दे-
“छह महीने का अकाल,
दस महीने का संकट-
सभी को दे गयी मात
अबकी यह चार दिनों की बरसात|
हफ्ता भर डूबे रहे राजेंद्रनगर- कन्कड़बाज,
धो दिया पुनपुन ने पटना की धरती का सुहाग|
हथिया नक्षत्र में सुनेंगे फिर क्या हम बादल राग,
गरीब नागरिकों की किस्मत में लग गयी आग,
सरकार तक मिटा न पायेगी दाग|” (2)

यह कवि का जीवन-दृष्टिकोण है, समसामयिक घटना को इतिहास की तरह प्रस्तुत करना, जिसे पढ़कर आज भी पाठक उस दृश्य एवं सामाजिक सरोकारों को महसूस कर सकें|


कवि एक चाक्षुप बिम्ब का निर्माण करता है, उनकी रचनाएँ पढ़ते-पढ़ते पाठक उस लोक की उस दृश्य की सैर कर लेता है| भाव्पान कराने की अद्भुत क्षमता युक्त यह धुरंधर कवि अपने अचरज भरे लोक, भौगोलिक परिवेश में, सामाजिक जीवन में भटकने को मजबूर करता है| जो लोक ग्राम्य-जीवन को नजदीक से नहीं देखे हैं, सिर्फ पिकनिक, घुमने में ही गाँव देखे हैं, वे इनके दृष्टि से गाँव देख कर स्तब्ध रह जाते हैं| अकाल के बाद उनकी कविता वास्तव में कवि के संवेदन शील मन तथा ग्राम्य जीवन का खुला दस्तावेज है-
“कई दिनों तक चूल्हा रोया,
चक्की रही उदास|
कई दिनों तक कानी कुतिया,
सोई उसके पास,
कई दिनों तक लगी भीत पर,
छिपकलियों की गश्त,
कई दिनों तक चूल्हों की भी,
हालत रही शिकस्त|
दानें आये घर के अन्दर
कई दिनों के बाद
धुँआ उठा आँगन के ऊपर
कई दिनों के बाद|
चमक उठी घर भर की आँखें
कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाखें,
कई दिनों के बाद|” (3)


जीवन का इतना यथार्थ वर्णन, कवि के सूक्ष्म निरीक्षण दृष्टि का परिचायक है| अक्कल के बाद जब घर में दाने आये, बाल-बच्चों के साथ जानवर, कीट-पतंगों में भी जो उत्साह छा गया, उसका चक्षुप बिम्ब कवि ने बखूबी खीचा है| उन्होंने कवियों के भी चित्र साकार किये हैं, निराला रवि ठाकुर आदि कवितायेँ उनके कवि और कविता के प्रति सम्मान को दर्शाती है-
“रुन-झुन रुन-झुन
सुने थे तुमने
भगवती वीणापाणि शारदा के नुपूर
विश्ववन्द्य भारतीय महाकवि ठाकुर!” (4)

इसी प्रकार विराला का व्यक्तित्व वर्णन करते हुए कहते हैं-
“झाँझ और घड़ियाल बजाते
मर्मज्ञों को खूब रिझाते, खूब लजाते
हे औढर औघड़ बंभोला
परम प्रबुद्ध महाकवि!
वे ही तुमको पागल कहते जी है दुष्ट अनार्य
प्रगतिशील मानवता के हो सूझ-बूझ तुम|” (5)

नागार्जुन के मन में अपने संस्कृति, पूर्व कवि सभी के प्रति प्रेम तथा सम्मान है| एक लोककवि का उदात्त गुण है, जो उदस्त लोगो को प्रतिष्ठित करे, लोक में मान-प्रतिष्ठा बढ़ाये, न कि स्वयं को सबसे श्रेष्ठ सिद्ध करे| भाषा का प्रयोग बड़े दायरे में करते हैं, भाषा में लोक, संस्कृति, कला, देशज, सभी प्रयुक्त हैं| ‘औढर’, ‘औघड़’, बमभोला जैसे शब्दों का चयन उनके उन्मुक्त भाषा प्रयोग की और इंगित करते हैं|


डॉ. रामविलास शर्मा ने नागार्जुन के भाषा के लिए लिखा है- “हिन्दी भाषी क्षेत्र के किसान मजदूर जोस तरह की भाषा आसानी से समझते और बोलते हैं, उसका निखरा हुआ रूप काव्यमय रूप नागार्जुन के यहाँ है|” इस प्रकार जीवन की भाषा लोक की भाषा को समझने एवं प्रयुक्त करने में बहुत ही सामर्थ्यवान कवि हैं| यथा-
“झूठ-झूठ सुजला-सुफला के गीत
न हम अब गायेंगे,
दाल-भात तरकारी जब तक नहीं
पेट भर पायेंगे|” (6)


यहाँ बोलचाल की ग्राम्य भाषा दाल-भात तरकारी का काव्य में प्रयोग एकदम यथार्थ जीवन को चित्रित करता है| समाज के कच्चे चिठ्ठे को पाठक के सामने प्रस्तुत करने की बेवाक क्षमता इनके अन्दर छिपी है, कोई बनावट नहीं है, जो सामाजिक परिस्थितियाँ हैं, उसका सचित्र वर्णन, शैलीगत विशेषता है|

नागार्जुन की बेवाक वर्णन शैली, समाज का जीवंत चित्रण, उन्हें अन्य कवियों से एकदम अलग करता है| ‘प्रेत का बयान’ कविता इसका उदाहरण है-
“ओ रे प्रेत-”
कड़क कर बोले नरक के मालिक यमराज
सच-सच बतला!
कैसे मरा तू ?
भूख से- अकाल से ?
बुखार- कालाजार से ?
पेचिश बदहजमी, प्लेग महामारी से ?
कैसे मरा सच-सच बतला!”
खड़ खड़ खड़ खड़ हड़ हड़ हड़ हड़
काँपा कुछ हाड़ो का मानवीय ढाँचा,
नचाकर लंबे चमचों सा पंचगुरा हाथ
रूखी पतली किट-किट आवाज में
प्रेत ने जबाब दिया –
“महाराज!
सच-सच कहूँगा
झूठ नहीं बोलूँगा
नागरिक हैं हम स्वाधीन भारत के...
पूर्णिया जिला है, बस्ती रूपकली
जाति का कायथ
उम्र कुछ अधिक पचपन साल की
पेशा से प्राइमरी स्कूल का मास्टर था
- किन्तु भूख और क्षुधा नाम हो जिसका
ऎसी किसी व्याधि का पता नहीं हमको|
.... .... .... ........
रह गए निरुत्तर
महामहिम नरकेश्वर|” (7)


यहाँ कवि द्वारा चयनित शब्द एवं भाव उनके कल्पना शक्ति का अद्भुत नमूना है| कवि मानसिक बिम्बों को गढ़ने में बहुत माहिर है, उसकी सोच समाज के चारों तरफ से फ़ैली विसंगतियों को चुनने में समर्थ है| अत: यह कहना बिल्कुल सटीक है कि नागार्जुन लोक-चेतना के कवि हैं, उनकी कविता में लोक सर्वत्र व्याप्त है| लोक काव्य के मूल में है|

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