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लोक-साहित्य और संस्कृति की दृष्टि से मालवा अत्यंत समृद्ध है 


इंदौर। मालवा, लोक-साहित्य और संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। लोकोक्ति या मुहावरा सुंदर रीति से कही गई उक्ति या कथन है, जिसकी लोक व्याप्ति कन्ठानुकंठ होती है। ये यूँ ही नहीं गढ़ ली जाती, बल्कि इनके पीछे अनेक सदियों का अनुभव और ज्ञान की अक्षय निधि सन्निहित है। लोकोक्तियाँ दिखने में छोटी लगती हैं, परन्तु उनमें गम्भीर विचार और भाव रहते हैं। मालवी लोकोक्तियों में जीवन का मर्म और अनुभव का सार देखने को मिलता है।  यह बात विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलानुशाशक हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो.शैलेन्द्र शर्मा  ने अखंड संडे द्वारा आयोजित मालवी कवयित्री हेमलता शर्मा भोली बेन  द्वारा संकलित लोकोक्तियाँ एवं मुहावरा संकलन अपणो मालवो के ऑनलाईन लोकार्पण अवसर पर कही।अध्यक्षीय उद्बोधन में गांधीवादी विचारक वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल त्रिवेदी ने कहा की मालवा में बहुत सहजता है ।  मीठी बोली के साथ सादगी से जीना यहाँ के लोगों की विशेषता है । मालवा में  लेखन की परंपरा से ज्यादा  बोलने की परंपरा, मिलने जुलने की परंपरा, सुख-दुख में एक दूसरे के काम आने की परंपरा से हमारो साहित्य विकसित हुआ है  और ये जो हमारी बोलचाल की परंपरा है इसी ने हमको जि़ंदा रखा है । मालवा प्रांत की अध्यक्षा माया मालवेंद्र वदेका ने कहा की लोक परंपराओं में इन कहावतों का उपयोग होता है इनका बड़ा महत्व है। बड़ी से बड़ी बात हम कहावतों और मुहावरों का प्रयोग कर आसानी से कह देते हैं ।


अपने संपादकीय उद्बोधन में मुकेश इन्दौरी ने कहा की तुलसी की टूटी हुई माला के बिखेर हुए मोतियों को समेटकर माला में गूंथने का कार्य भोली बेन ने इस संकलन में किया है । जिसकी महक से खासकर युवा पीढ़ी आकर्षित होगी और इससे मालवी के संरक्षण और संवर्धन के प्रयासों में मील का पत्थर साबित होगी। संकलनकर्ता हेमलता शर्मा भोली बेन ने कहा की इस पुस्तक का उद्देश्य विलुप्त होती मालवी कहावतों और मुहावरों को धरोहर के रूप में कृति में संग्रहित कर खासकर युवा पीढ़ी को मालवी बोली की मिठास से अवगत कराना है । उन्होंने बताया पुस्तक निशुल्क रहेगी और इसका अधिक से अधिक वितरण किया जाएगा खासकर विद्यालयों में साथ ही इसको पाठयपुस्तक के रूप में शामिल क रने के भी प्रयास किए जाएंगे । इन्दौर लेखिका संघ की संस्थापक स्वाती तिवारी ने कहा की -  मालवी बोली मीठी होने के साथ-साथ या बहुत समृद्ध और संपन्न भाषा है । इसका क्षेत्र बहुत विस्तृत है इसकी खासियत है बहुत ही सहज और सरल जो मालवी नहीं जानता वो भी मालवी समझ जाता है । बदलते परिवेश में मोबाईल के दौर में विलुप्त होती मालवी बोली का सरंक्षण  बहुत ज़रूरी है यह हम सभी का दायित्व है । 


रतलाम से हल्ला गुल्ला मंच के संयोजक अलक्षेंद्र व्यास ने कहा की  - युवाओं के मन में मालवी के प्रति स्नेह जागृत करने में यह पुस्तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी ।वरिष्ठ मालवी रंगकर्मी रजनीश दवे ने कहा की मालवी के बिखरे हुए साहित्य को संकलन कर कृति के रूप में संग्रहित कर आने वाली पीढ़ी को समाज को संपूर्ण मालवा को एक धरोहर के रूप में सौंप कर भोली बेन ने बहुत प्रशंसनीय कार्य किया है । कार्यक्रम में संभागीय संयुक्त संचालक कोष एवं लेखा इन्दौर देवधर दरवाई, देवास से ब्यूरो चीफ नईदुनिया उदय मंडलोई, खण्डवा से डिसिट्रक्ट कमांडेंट महेश हनोतिया, सतना से पं शरद द्विवेदी , रतलाम से संजय परसाई आगर से संजय शर्मा मनोहर दुबे, डॉ. प्रभु चौधरी, प्रियंका श्रीवास्तव, भोपाल से वत्सला पाठक मुम्बई से राघवेंद्र तिवारी मन्दसौर से लालबहादुर श्रीवास्तव धामनोद से कैलाश सिंहल चेतन मण्डल के अध्यक्ष प्रदीप जोशी, लेखिका संघ की अध्यक्षा चेतना भाटी,  संभाग पुस्तकालय संघ अध्यक्ष डॉ.जी.डी.अग्रवाल, वरिष्ठ शिक्षाविद् अनिल ओझा, प्रदीप नाईक, हरमोहन नेमा, राधेश्याम यादव, भीमसिंह पंवार, कार्तिकेय त्रिपाठी,  विक्रम क्षीरसागर,  रागिनी शर्मा, डॉ. शशिकला अवस्थी, शोभारानी तिवारी, कुसुम दुबे सरला मेहता रत्न प्रभा पोरवाल, अंजुल कंसल,  हंसा मेहता आदि अखंड संडे परिवार के सदस्य उपस्थित थे ।  आभार वरिष्ठ शिक्षाविद् अनिल ओझा ने माना ।


 


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