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धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा



✍️रश्मि वत्स


आईए सर्वप्रथम ये जानते हैं कि धर्मनिरपेक्षता ,पंथनिरपेक्षता या सेक्युलरवाद है क्या ?सीधे तौर पर कहें तो धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि सभी धर्म एक समान हैं और सरकार द्वारा किसी भी धर्म को अपनाने में उनका कोई हस्तक्षेप न हो ।इसके दो सिद्धांत दिए गए हैं :- पहला तो ये कि राज्य के संचालन एवं नीति निर्धारण में किसी मजहब (रिलीजन) का कोई हस्तक्षेप न हो और दूसरा सभी धर्मों के के लोग कानून, संविधान एंव सरकारी नीति के आगे समान हैं ।

अब यह प्रश्न आता है कि क्या धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा ढ़ोग है ? कई धर्मनिरपेक्ष देशों में धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए संविधानिक कायदे कानून बनाए गए हैं।परंतु देखा गया है कि बहुसंख्यिक जनता के होते हुए उनके धार्मिक विश्वासों से प्रेरित होकर समय-समय पर इसका स्वरूप बदलता रहता है।ये देखा गया है कि एक समुदाय  के लोग दूसरे समुदाय के लोगों की धर्मनिरपेक्षता की बात को ढ़ोग बताते हैं ।कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कानून का उल्लंघन किया जाता है। धर्मनिरपेक्षता को ढ़ोग कहना बताना उचित नहीं है क्योंकि ये अवधारणायें हमारे समाज से ही निकलती हैं। हम ये कह सकते हैं कि कोई व्यक्ति या संस्था या समाज का कोई अंग अपने निजी स्वार्थ हेतु इस अवधारणा का प्रयोग करती है तो वह एक ढ़ोग का रुप ले लेता है ,परंतु कोई भी अवधारणा गलत नही हो सकती है ।माना जाए तो धर्मनिरपेक्षता एक राज्य के अस्तित्व के लिए आवश्यक भी है और यह राज्य का एक महत्वपूर्ण अंग भी है ।

अब सवाल ये आता है कि क्या कोई व्यक्ति, समाज या देश धर्मनिरपेक्ष हो सकता है ? तो ये कहना बिल्कुल उचित होगा कि हाँ कोई भी व्यक्ति, समाज और देश धर्मनिरपेक्ष हो सकते हैं ।दृष्टिगत रूप से देखा जाए तो कोई भी व्यक्ति अपने धर्म के साथ-साथ अन्य किसी धर्म में रूचि रख सकता है  बिना कानून व्यवस्था का उल्लंघन किए बगैर तो वह पूर्ण रूप से स्वत्रंत है ।दूसरा आता है समाज ,कोई भी समाज बिल्कुल धर्मनिरपेक्ष हो सकता है जबतक वह किसी अन्य समाज की धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुँचाऐ ।तीसरा कई ऐसे देश हैं जो  धर्मनिरपेक्षता की श्रेणी में आते हैं जैसे की  भारत,अमेरिका, प्रांस,ब्रिटेन आदि।

यदि देखा जाए तो अमेरिका एक पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है  ।अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन में यह सिद्धांत स्पष्ट रुप से अंकित है कि उसके नागरिकों को अपने धर्म पर निर्णय लेने का पहला औंर अंतिम अधिकार है ।इसके साथ किसी भी नागरिक की धर्म के समझ के बीच अमेरिका की सरकार किसी भी तरह का हस्तक्षेप नही करेगी,वहीं इसके उलट अमेरिकी संविधान ईश्वर को साक्षी मानकर लागू किया गया है ।

भारतीय संविधान द्वारा भारत पंथनिरपेक्ष देश घोषित किया गया है।पंथनिरपेक्ष होने का अर्थ है कि भारतीय नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने की पूरी संवत्रता है।लेकिन कोई धर्म अधिकारिक नही है।सरकार सभी धार्मिक मान्यताओं और आचरणों को समान सम्मान देगी ।*
*मेरठ(उत्तर प्रदेश)


 


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