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काली नदी में प्लास्टिक फूल



*प्रो. बी.एल. आच्छा


राजकुमार सिद्धार्थ बहुत दिनों से महल में ही थे। कविताओं में मन रमा था -'अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों न सबका मन भाए। 'वे व्यग्र हो गए। आँखों के सामने अमराई। बहती सी नदी ।मोर, कोकिल के मधुगान। तितलियों की रंगोली। सारथी को बुलाया। कहा-" हम अभी किसी गाँव का भ्रमण करना चाहते हैं।" सारथी ने गाँव की ओर रथ दौड़ा दिया।


कटे जंगल और चिलचिलाती धूप ने राजकुमार के हरियाले सपने को 40 डिग्री तापमान से झुलसा दिया। बोले -"यहाँ तो बड़ा-सा सरोवर था। घने पेड़ ।अब यह बस्ती और सिकुड़ता सा तालाब!" सारथी बोला-" हाँ, राजकुमार! सरोवर में हाथी डूब गहराई के कारण इसे हाथीनाडा भी कहते हैं ।पर अब हर गाँव- शहर में गंदी नालियाँ उनमें संगम रचाती हैं।फिर अतिक्रमण और लेनदेन से नए मकान सरोवर को धक्का मारते रहते हैं ।"तभी राजकुमार की नजर कुछ भैंसों पर गई ।बोले-" ये भैंसें सरोवर के पास खड़ी है। पानी में तैर क्यों नहीं रही हैं?"सारथी बोला-" राजकुमार ,शायद ये भैंसें सोच रही हैं कि अपने काले रंग को तालाब के गंदे काले पानी से क्यों बदरंग करें!"


राजकुमार ने फिर सवाल किया -"एक भैंस तो तैर रही है ।"
"हाँ राजकुमार! यह पगुराई भैंस शायद गरीबी रेखा के नीचे की हो ।बेबसी है उसकी।"
"ये काली काली सी परत  क्या जमी है?"
"कुमार !जैसे दूध उबालने पर मलाई जम जाती है।ठीक उसके  उलट  यह गंदे-सड़े पानी की रबड़ी-गाद है।" "अच्छा ये दूर में सफेद सफेद फूल कैसे नजर आ रहे हैं?"
" राजकुमार !दूर-दूर तक काई और जलकुंभी का साम्राज्य है। उन्हीं में उलझी ये प्लास्टिक पन्नियाँ हैं।नालियों में बहकर या हवा में उड़ कर ये काले पानी में सिर उठाए दिख रही हैं। गायों के खाने से बची हुईं।"
" क्या गाय प्लास्टिक खाती हैं ?"
" बेबसी है भटकती गायों की।  बची हुई प्लास्टिक कई रंगों में  इस तालाब की शोभा बिखेर रही हैं ।नीले प्लास्टिक  में नीलकमल ।गुलाबी में अरविंद ।काले में कृष्णकमल। सफेद पन्नियों को देखकर ऐसा लगता है, जैसे काली चमड़ी पर फफोले  उकस आए हों।और उधर देखिए राजकुमार !कभी सफेद बगुले नजर आते थे ,अब झाड़ियों पर सफेद पन्नियाँ झंडे गाड़ रही हैं।यह काली रबड़ी -गाद तो सफ़ेद पन्नियों की चमक के लिए काली कसौटी है। इस गाढ़ी गाद में  बुदबुदे तो ब्लैक होल से फुसफुसाते रहते हैं।"
राजकुमार ने टोका-" अरे तुम तो कविता करने लगे। मेरे भीतर तो हरियारे गाँव का स्वच्छ सपना सनाका खा गया। चलो ,अब मुझे बड़ी नदी पर ले चलो ।यमुना भी तो पास ही है न?"  सारथी उन्हें यमुना के तीर ले गया। कदंब के बचेखुचे पेड़। पूछा -"नदी कहाँ है ?"सारथी ने कहा -"नदी का चौड़ा पाट तो सूख गया है। दूर कहीं काला पानी नजर आ रहा है यमुना का।" राजकुमार के मन में कृष्ण लीला के दृश्य चलायमान थे। कारागार से कृष्ण को सिरपर उठाकर  यमुना को पार करते नंद बाबा के। यमुना के श्यामल जल में पारदर्शी कृष्ण के बदन के।यमुना के जल से गेंद को निकाल कर लाते कन्हैया के। तभी यमुना किनारे खेलते हुए बच्चों की गेंद यमुना के गाढ़े काले जल पर छक्का मार गई। राजकुमार के श्वेत वस्त्रों पर  काले  छींटे प्रिंट हो गए। सारथी हक्का-बक्का रह गया।बोला-" राजकुमार अब यहाँ से चलें। ये वस्त्र...।" राजकुमार  अविचल रहे।बोले-" कृष्णलीला के चित्रों में खोया था। सोचा कालियादह में कैसे श्री कृष्ण गेंद को बचा लाए होंगे !"सारथी ने कहा-" राजकुमार यह द्वापर युग की यमुना नहीं,आधुनिक विकास की नदी है। शहराती सभ्यता के सैंकड़ों नाले इन  नदियों में सूर का पद गाते हुए मिल जाते हैं -"एक नदिया एक नार कहावत मेलोई नीर भरो।" और अब लोकतंत्र है ।सैंकड़ों नालों ने यमुना के जल को अल्पमत में लाकर मेलोई नीर भर दिया है ।देखिए ना ,ये प्लास्टिक के फूल कैसे झंडी बनकर नारे लगा रहे हैं !"


राजकुमार चिंतित हो गए।बोले-" श्रद्धालु जन अब यमुना के जल का आचमन कैसे करेंगे ?"सारथी ने कहा -"राजकुमार आज का युग आचमन का नहीं, चमन का युग है। कारखानों और शहराती सभ्यता की सीवरेज लाइनों के चमन का युग है। जितने केमिकल बहाएँगे ,उतना ही विकास नजर आएगा ।काला जल ही औद्योगिक सभ्यता की सुगंध युक्त निशानी है ।कभी नदी ही  कस्बे का पवित्र महाबाथरूम हुआ करती थी। अब घर का बाथरूम ही सबसे पवित्र होता है। घर में बेस्ट,नदी में वेस्ट।अब 'समुद्र वसने देवीम् के बजाय 'समुद्र वसने गंदगीम्' इनकी यात्रा है ।"


राजकुमार उदास हो गए।बोले-" राज्य इसे स्वच्छ क्यों नहीं करते?" सारथी ने कहा -"पहले नदी का  अवतरण पुरखों की मुक्ति के लिए था। अब लोकतंत्र में प्रोजेक्ट है। अंतहीन प्रोजेक्ट ।राजनीति का लोकपसंद एजेंडा भी।रोजगार का साधन भी। अब सरोवर में खिलते फूल किताबों में हैं, कीचड़ में नहीं ।गाँव का नाला  हो, तालाब हो या शहराती नदी। लोग उसी में गंदगी की आहुति बहा देने को विकल हैं ,तो स्वच्छता के प्रोजेक्ट तो अंतहीन यात्रा है ।राजकुमार का मन उदास हो गया। किताब में सरोवर में खिले फूल देखे थे। अब कीचड़ में प्लास्टिक फूलों को उन्मुक्त  खिलते देख उनका बाल मन भारी हो गया। उदास होकर वे राजमहल लौट आए ।


*प्रो. बी.एल. आच्छा, चैन्नई


 


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