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अच्छा हुआ कोरोना जो तुम आए



*हेमलता शर्मा 'भोली बैन'

आज कोरोना वायरस (कोविड-19) का प्रकोप वैश्विक स्तर पर छाया है और संपूर्ण विश्व इस महामारी के कारण त्राहिमाम कर रहा है, वहीं हमारे समाज शास्त्रियों की चिंता का विषय यह है कि इसके समाज पर क्या प्रभाव होंगे?

कोरोना महामारी के चलते चीन, इटली, अमेरिका, स्पेन, ब्रिटेन जैसे देशों सहित भारत में भी लाकडाउन की स्थिति निरंतर जारी है , जिसमें अति आवश्यक सेवाओं को छोड़कर समस्त सेवाएं प्रतिबंधित हैं । साथ ही जनता को घरों से निकलने की इजाजत नहीं है ।  बड़ी-बड़ी कंपनियों सहित सरकारों ने भी अपने कर्मचारियों को "वर्क फ्रॉम होम" करने के निर्देश दिए हैं । ऐसी स्थिति में चीनी मीडिया से आती पति-पत्नी के तलाक, मार कुटाई आदि की खबरें सोशल मीडिया पर छाई हुई है ‌। जहां विदेशों में बाहर निकलने पर कई डालर का जुर्माना एवं जेल जैसा दंड नागरिकों को सहना पड़ा है वहीं भारत देश में लाकडाउन का एक माह बीत जाने के बाद भी ऐसी कोई खबर अभी तक सुनने में नहीं आई है । हां यह अवश्य है कि नागरिकों की दिनचर्या बदल गई है । पहले जहां प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारियों को प्रातः बस पकड़ने की दौड़-भाग रहती थी, वही अब वे सुबह आराम से उठने के बाद योग, वर्जिश आदि में संलग्न है। पहले जहां लोगों के पास टीवी देखने, लोगों से बात करने का समय नहीं होता था, अब लोग टीवी पर रामायण महाभारत जैसे धार्मिक सीरियल देख रहे हैं । साथ ही घंटों दूरभाष पर पुराने विस्मृत हो चुके रिश्तेदारों, मित्रों से बात कर रहे हैं ।  सोशल मीडिया पर भी लोग आपस में लगातार संपर्क में बने हुए हैं और लाकडाउन ने कम वस्तुओं से काम  चलाना, पुरुषों को गृहकार्य में सहयोग करना भी सिखा दिया है । कवियों की तो मानो पौ-बारह हो गई है ।‌ एक ओर ऑनलाइन काव्य गोष्ठियों का दौर निरंतर जारी है तो दूसरी ओर लूडो, चंग-पो, सांप-सीढ़ी, कैरम जैसे इनडोर गेम का क्रेज बढ़ा है । कोरोना के चलते  'सोशल डिस्टेंसिंग' शब्द प्रचलन में आ गया है, किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि लोग सामाजिक रूप से एक दूसरे के और करीब आ गए हो ।  भले ही फिजिकली आपस में नहीं मिल पा रहे हो, किंतु एक -दूसरे की मदद करने का जज्बा उभरकर सामने आया है । 'सर्वजन हिताय' एवं 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना अपने चरम पर है ।  जहां लोग भूखों को भोजन कराने में यथायोग्य सहायता दे रहे हैं, वही लोगों को "स्टेहोम स्टेसेफ" का संदेश भी दे रहे हैं । लोगों की रचनात्मकता एवं प्रतिभा भी उजागर हो रही है, कोई गीत गा रहा है, कोई वाद्ययंत्र बजा रहा है तो कोई शार्ट फिल्म बनाकर कोरोना से लड़ने का संदेश दे रहा है । 

एक और जहां शहीद हुए कोरोना योद्धाओं के प्रति गर्व का भाव है तो वही उन पर हमला करने वालों के प्रति रोष। साहित्यकारों ने भी अपनी लेखनी के माध्यम से जनता में देश प्रेम और कोरोना से जंग जीतने की भावना को बल दिया है । साफ तौर पर कहा जा सकता है कि महामारी से मरीजों का बढ़ता आंकड़ा हमारे लिए चिंता का विषय है तो समाज में आए सकारात्मक परिवर्तन जैसे दान प्रवृत्ति, मित्रता का भाव, सामंजस्य संयम, दृढ़ संकल्प बचत की प्रवृत्ति आदि देश के लिए शुभ संकेत इंगित करते हैं। इसलिए सब्र रखें फिर से एक नई सुबह होगी अभी घर में रहें सुरक्षित रहें।

*इंदौर

 


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