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वर्तमान संदर्भों में स्त्री स्वतंत्रता के बदलते मायने स्त्री स्वतंत्र हो किससे ?



- सरिता सुराणा





1960 के दशक से जबसे 'नारी मुक्ति आंदोलन' शुरू हुआ था, तब से ही जब-तब स्त्री स्वतंत्रता की बात बड़े जोर-शोर से उठाई जाती है। खासकर महिला दिवस के अवसर पर विभिन्न महिला संगठनों द्वारा इस विषय पर अनेक सेमिनार आयोजित किए जाते हैं और उनमें चर्चा का विषय आमतौर पर यही होता है- स्त्री की स्वतंत्रता। प्रश्न उठता है कि इस स्त्री स्वतंत्रता का अभिप्राय क्या है? दैहिक स्वतंत्रता, मानसिक स्वतंत्रता या फिर सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता? एक स्त्री किस तरह की स्वतंत्रता चाहती है और क्यों? 

यह तो सर्वविदित तथ्य है कि हमारा भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज रहा है, जहां आज भी स्त्रियों की स्थिति उतनी सुदृढ़ नहीं है, जितनी अन्य विकसित देशों में है। आज़ अगर महिलाएं पढ़-लिखकर अपने बलबूते पर आगे आ भी रही हैं तो भी वहां पर भी स्त्री-पुरुष असमानता विद्यमान है। योग्य होते हुए भी आज भी लिंगभेद के कारण स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार प्राप्त नहीं हैं। यहां तक कि एक समान ओहदे पर काम करने वाले स्त्री-पुरुष के वेतनमान और अन्य सुविधाओं में बहुत फर्क रहता है।

आज़ भी एक कामकाजी महिला अपने ऑफिस में अपने बाॅस और पुरुष सहकर्मियों की प्रताड़ना का शिकार होती है, चाहे वह प्रताड़ना शारीरिक हो या मानसिक। घरेलू हिंसा का ग्राफ तो दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। तब विचारणीय प्रश्न यह उठता है कि स्त्री स्वतंत्र हो किससे?

अपने अस्तित्व से ?

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क्या नारी स्वतंत्रता का अर्थ एक स्त्री के लिए यह है कि वह अपने स्त्री होने के सत्य को झुठला दे? अगर उसका जन्म एक औरत के रूप में हुआ है तो वह जीवनपर्यंत औरत ही रहेगी, एक-दो अपवादों को छोड़कर, जिन्होंने अपना लिंग परिवर्तन करवा लिया। सृष्टि का अटल सत्य यही है कि स्त्री-पुरुष दोनों ही इसके विकास में समान रूप से भागीदार हैं और परिवार व समाज के निर्माण के लिए परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। जब एक के बिना दूसरे का जीवन अधूरा है तो सहयोग, सामंजस्य व परस्पर प्रेम भावना से एक साथ रहने की जगह स्वतंत्रता का विचार क्यों? 

स्त्रियोचित गुणों से ?

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वर्तमान संदर्भों में झांककर देखने से एक सत्य निकल कर सामने आता है कि तथाकथित आधुनिक कही जाने वाली कुछ महिलाओं ने स्त्रियोचित गुणों के परित्याग को ही स्त्री स्वतंत्रता का पर्याय मान लिया है और यही उनकी सबसे बड़ी भूल है। स्वतंत्रता और स्वछंदता दो अलग-अलग शब्द ही नहीं अपितु व्यापक अवधारणाएं हैं और दोनों के अर्थ में बहुत बड़ा अंतर है।

मातृत्व का वरदान प्रकृति ने स्त्री को ही दिया है, फिर चाहे वह वैवाहिक बंधन में बंधने के बाद मां बनने का सुख प्राप्त करे या विवाह से पूर्व। यह उसकी इच्छा पर निर्भर है क्योंकि आधुनिक प्रगतिशील महिलाएं विवाह बंधन में नहीं बंधना चाहती, परिवार की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहतीं परन्तु लिव-इन-रिलेशनशिप में रहकर या अन्य साधनों से मां जरूर बनना चाहती हैं। तथ्य चाहे जो भी हो लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि उसके बच्चे का बाप एक पुरुष ही होता है। वह नारी ही है जिसके दिल में दया, ममता, करुणा, त्याग और क्षमा की अजस्त्र धारा बहती है। नारी श्रद्धा और विश्वास की प्रतिमूर्ति होती है, तभी तो महाकवि जयशंकर प्रसाद ने उसके बारे में लिखा है-

'नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पद-तल में।

पीयूष स्त्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।'

अपने कर्त्तव्यों के निर्वहन से ?

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एक स्त्री के जन्म के साथ ही उसके परिवार व समाज के साथ अनेक रिश्ते जुड़ जाते हैं और वह अपने जीवन में कई भूमिकाओं का निर्वाह एक साथ करती है। यथा- पुत्री, बहन, बुआ, पत्नी, बहू, नन्द, देवरानी-जेठानी और मां की भूमिका। प्रत्येक भूमिका के साथ उसके कुछ कर्त्तव्य भी जुड़े हुए होते हैं। विशेषकर शादी के बाद एक पत्नी और बहू की भूमिका। अगर सास और बहू की भूमिका का हर स्त्री अच्छी तरह से निर्वहन करे, एक पति अपनी पत्नी की भावनाओं का सम्मान करें, उसे स्वयं निर्णय लेने का अधिकार दे, परिवार का प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे के आत्मसम्मान की रक्षा करें तो कोई भी स्त्री अपने परिवार से विमुख होकर स्वतंत्रता की बात नहीं करेगी।

विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

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एक स्त्री सही मायने में तभी स्वतंत्र और सशक्त हो सकती है जब उसके विचार स्वतंत्र हों, वह शिक्षित हो, अंधविश्वासों को प्रश्रय देने वाली न हो। उसे अपने विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता हो, स्व निर्णय का अधिकार हो। अपने साथ-साथ अपने परिवार की हितचिंतक हो। वह स्वाभाविक मनोविकारों यथा- क्रोध, ईर्ष्या, द्वैष, घृणा और क्षोभ से मुक्त हो। उसकी सोच सकारात्मक हो, दूसरों को सही दिशा देने वाली हो।

आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो

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आर्थिक रूप से परतंत्र स्त्री सदैव दूसरों पर आश्रित रहती है। बचपन में वह पिता पर, शादी के पश्चात पति पर और वृद्धावस्था में पुत्र पर आश्रित रहती है और इसीलिए परिवार में उसके निर्णय को मान्यता नहीं दी जाती है। लेकिन आज़ अधिकांश महिलाएं पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बन रही हैं।भले ही हर स्त्री किरण बेदी और कल्पना चावला नहीं बन सकती लेकिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार वह कुछ न कुछ तो अवश्य कर सकती है। आज़ अधिकांश शिक्षित महिलाएं नौकरी या व्यवसाय के द्वारा धन अर्जित करके अपने परिवार को आर्थिक रूप से सक्षम बना रही हैं। और तो और मजदूर वर्ग की अशिक्षित महिलाएं भी अपनी मेहनत की कमाई से अपने परिवार की गाड़ी चलाने में अपने पति का पूर्ण सहयोग कर रही हैैं। एक स्त्री के जीवन में असली स्वतंत्रता तभी आ सकती है, जब एक पुरुष उसके हर कार्य में उसका साथ दे, उसे सम्मान दे, आत्मसम्मान से जीने का अधिकार दे और उसे मात्र उपभोग की वस्तु न समझ कर अपने समान इंसान समझे। जिस दिन पुरुषों की मानसिकता बदल जाएगी, उस दिन से नारी स्वतंत्रता की बात करना बेमानी हो जाएगा और नारी स्वतंत्रता का यह नारा, नारा ही रह जाएगा।

- सरिता सुराणा, सिकंदराबाद




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