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साहित्य जितना उन्नत होता है उतना ही राष्ट्र उन्नत होता है



*अंकुर सहाय श्रीवास्तव 'अंकुर'*






अपने राष्ट्र में जिस भाषा का सर्वाधिक प्रचलन होता है वही भाषा राष्ट्रभाषा के पद को सुशोभित करती है, राष्ट्र की भाषा को राष्ट्रभाषा कहते हैं।राष्ट्र से तात्पर्य एक नियत भूभाग निश्चित विचारधारा तथा समान सभ्यता एवं संस्कृति के मानने वाले लोगों से है राष्ट्र के समस्त कार्य उसी के माध्यम से संपन्न होते हैं एवं जनता द्वारा तथा सरकार द्वारा वही मान्य होते हैं । जिस प्रकार राष्ट्रीय ध्वज किसी देश का प्रतिनिधित्व करता है और देश का गौरव बढ़ाता है ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीय भाषा राष्ट्र के नागरिकों में नवीन प्राण फूंकने हेतु संजीवनी का कार्य करती है भाषा के साथ-साथ साहित्य समाज का दर्पण होता है ।जिस प्रकार किसी राष्ट्र का अस्तित्व उसकी राष्ट्रभाषा के बिना शून्य है उसी प्रकार साहित्य के ज्ञान के बिना उस देश उस राष्ट्र की सारी कामनाएं शून्य हैं । एक अच्छे समाज का निर्माण  समाज करता है ।
हमारा भारत एक विशाल गणराज्य है, स्वयं की भाषा का ही राष्ट्रीय उन्नति में महान योगदान है हम विविधता में एकता वाले देश के नागरिक हैं । एक अच्छा साहित्य समाज में क्रान्ति लाता है ,समाज की बुराइयों का दोहन करता है। हमारा भारत वर्ष सदियों तक अंग्रेजों और अन्य विदेशियों का गुलाम रहा किंतु विदेशी विभिन्न शासक अपने देश की भाषा के माध्यम से शासन कार्यों को संचालित करते रहे स्वतंत्रता से पूर्व अंग्रेजी शासनकाल में समस्त कार्य अंग्रेजी लिपि के माध्यम से होते रहे किंतु धीरे-धीरे अंतर में हिंदी के विकास के साथ-साथ सारे कार्य हिंदी में होने लगे।


 साहित्य और समाज एक दूसरे के पर्याय हैं साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है साहित्य एवं समाज का अटूट संबंध भी है जिस तरह का वातावरण समाज का होता है उसकी झलक हमें उस समय के साहित्य में परिलक्षित हो जाती है एक साहित्यकार सामाजिक प्राणी होते हुए उस समाज का अभिन्न अंग हो जाता है वह समाज में जन्म लेता है समाज में ही पलता बढ़ता है और समाज का ही होकर रह जाता है उसके साहित्य में समय के समाज का चित्र प्रवृत्त होता रहता है ।

प्रत्येक साहित्यकार अपने समाज से किस सीमा तक प्रभावित होता है इसकी जानकारी के लिए जब हम साहित्यकार को जीर्ण - शीर्ण  रीति - रिवाज एवं मान्यताओं पर प्रहार करते हुए देखते हैं तो सोचने पर विवश हो जाते हैं । कहा गया है--

अंधकार है वहां जहां आदित्य नहीं है ,

मुर्दा है वह देश जहां साहित्य नहीं है ।।

साहित्य व शक्ति है जिसके समक्ष तलवार ,तोप, बम या अन्य कोई भी आसुरी शक्ति नगण्य है। साहित्य में मानव की अनुभूति उसके भूत, भविष्य एवं वर्तमान की चिंता और साथ ही साथ सत्यम - शिवम - सुंदरम की भावना विकसित होती है और साहित्य मनुष्य में संस्कार उत्पन्न करते हैं ।

अतः साहित्य एक प्रकार की संस्कृति भी है । अतः जिस देश का साहित्य जितना उन्नत होता है उतना ही वह राष्ट्र उन्नत समृद्ध प्रगतिशील एवं व्यवस्थित होता है । एक अच्छे साहित्य को समाज में क्रांति के लिए लाया जाता है वह साहित्य समाज में व्याप्त निराशा बुराई तथा अन्य विसंगतियों को दूर करने में सक्षम होता है । राष्ट्र की उन्नति साहित्य की उन्नति पर आधारित होती है ।

मनुष्य में उत्तम गुणों का विकास समाज द्वारा ही होता है किंतु मनुष्य के अंदर चरित्र का संगठन साहित्य ही करती है । समाज से परे साहित्य की कल्पना मात्र ही व्यर्थ है समाज के बदलने के साथ-साथ साहित्य में परिवर्तन होता रहता है साहित्य एवं शक्ति होती है जिसके द्वारा मनुष्य में एक नई चेतना का विकास होता है या चेतना मनुष्य को गुलामी की जंजीर से बाहर निकालने में समर्थ होती है । साहित्य वह संजीवनी बूटी है जो कि एक मरे हुए प्राणी में भी प्राण फूंक दे। साहित्य ने समय-समय पर समाज को दिशा और दशा दी है साहित्य वह है जिसकी कल्पना मात्र से हम अपने अंदर एक नई ऊर्जा का प्रवाह पाते हैं ।

साहित्य मानव की अनुभूतियों की खान है साहित्य में वर्तमान भूत भविष्य तीनों निहित है । मनुष्य को मनुष्य को यदि समाज से अलग कर दिया जाए तो उसकी उन्नति असंभव है वह कितना भी बुद्धिमान क्यों ना हो उन्नति के लिए उसके अंदर साहित्य का होना आवश्यक है । साहित्य मनुष्य के अंदर चरित्र का निर्माण करता है तो वहीं साहित्य समाज के लिए उसे उत्तरदाई बनाने का प्रयास करता है। साहित्य की शक्ति द्वारा ही मानव में नई चेतना का विकास होता है साहित्य से परे समाज की कल्पना व्यर्थ है ठीक उसी प्रकार समाज की कल्पना साहित्य के बिना अधूरी है ।

जिस प्रकार से शब्द और अर्थ एक दूसरे पर आश्रित होते हैं ठीक उसी प्रकार साहित्य और समाज भी एक दूसरे पर आश्रित हैं या यूं कहें एक सिक्के के दो पहलू हैं । साहित्य समाज की विपत्ति को दूर करने का काम करता है । आज के समाज में भाषा ,ध्वज के साथ  - साथ साहित्य का स्थान सर्वोत्तम माना गया है । आज हमें ऐसे साहित्य की आवश्यकता है जो समाज में व्याप्त हर कुरीतियों को दूर कर एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण कर सके ।

 

*अंकुर सहाय श्रीवास्तव "अंकुर",आजमगढ़ उत्तर प्रदेश 

 asstava1985@gmail.com, मो 9454799898

 





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