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ए डी एच  डी :बीमारी को अनदेखा तो नहीं कर रहे



*डॉ अरविन्द जैन*
जो  जीव /शिशु जन्म लेता हैं यदि वह जन्मजात रोगग्रस्त होता हैं या जन्म के बाद बाह्य संक्रमन  से ग्रसित होता हैं .शिशु या मानव में रोग के स्थान दो होते हैं पहला शरीर और दूसरा मन .दोनों का एक दूसरे पर प्रभाव पड़ता हैं .कभी कभी शिशु के क्रियाकलापों  से हम बहुत प्रभावित होते हैं पर कभी कभी वे रोगजन्य होते हैं .इस पर ध्यान रखना आवश्यक हैं .
हम सभी अपने बच्चे की परवरिश में अपना सर्वोत्तम  देना चाहते हैं। लेकिन कई बार स्थितियां ऐसी होती हैं कि हम अपने बच्चे की बीमारी को नहीं पहचान पाते हैं, खासतौर पर अगर बीमारी उसकी मानसिक  स्वास्थ्य   से जुड़ी हो। ऐसी ही एक दिक्कत या मेडिकल लैंग्वेज में कहें तो डिसऑर्डर है ADHD (Attention Deficient Hyperactive Disorder)यह डिसऑर्डर बच्चे की लर्निंग और सोशल ग्रोथ में दिक्कतें खड़ी करता है और बच्चा अपनी योग्यता के अनुसार रिजल्ट नहीं दे पाता है।        
बच्चे शरारती होते ही हैं
हम सभी जानते हैं बच्चे शरारती होते ही हैं। लेकिन शरारती बच्चों और एडीएचडी डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों में फर्क पहचानना बहुत जरूरी है। इस बीमारी के लक्षण आमतौर पर बच्चे में 3 से 4 साल की उम्र में दिखने शुरू हो जाते हैं और 12 से 13 साल की उम्र तक बने रहते हैं और बच्चे की चीजें सीखने की क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। जबकि कुछ बच्चों में ये लक्षण 20-25 की उम्र तक भी बने रह सकते हैं।
इस डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों को अटेंशन(ध्यान ) और कंसंट्रेशन(एकाग्रता)  से जुड़ी समस्याएं होती हैं। इनके लिए किसी एक चीज पर ध्यान बनाए रखना या किसी बात को ध्यान से सुनना मुश्किल होता है। यही वजह होती है कि पालक  और शिक्षक  की बताई गई बातों को ये ध्यान से नहीं सुनते हैं या याद नहीं रख पाते हैं, क्योंकि इनका ब्रेन लगातार ऐक्टिव रहता है और इससे इनकी याददाश्त  पर बुरा असर पड़ता है।
इस डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे बार-बार वही गलतियां दोहराते हैं, जिन्हें लेकर उन्हें पहले भी कई बार डांट पड़ चुकी होती है और समझाया जा चुका होता है। ये बच्चे किसी भी काम को बमुश्किल पूरा कर पाते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि ये बहुत देर तक किसी काम में ध्यान नहीं लगा पाते और पहले काम को बीच में ही छोड़कर तुरंत दूसरे काम में लग जाते हैं और दिनभर उछलकूद मचाते हुए इसी तरह की ऐक्टिविटीज दोहराते रहते हैं।
ए डी एच डी  डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे अक्सर अपना सामान खोते रहते हैं। जैसे, स्कूल बैग, बुक्स और लंच बॉक्स जैसी डेली यूज की चीजें संभालना भी उनके लिए मुश्किल रहता है और इन्हें याद नहीं रहता कि इन्होंने अपना सामान कहां रखा है?
ए डी एच डी   से पीड़ित बच्चे हर समय बेचैन से रहते हैं, हाई एनर्जी फील करते हैं और एक साथ कई काम करने की कोशिश करते हैं।
जिन बच्चों को एडीएचडी की शिकायत होती है, वे बहुत बातें करते हैं और बहुत जल्दी गुस्सा भी हो जाते हैं। ये बहुत अधिक उछलकूद करते हैं, दूसरों के काम में दिक्कतें पैदा  करते हैं या दो लोगों को आपस में बात भी नहीं करने देते हैं। ऐसे बच्चों को शांत होकर खेलने या आराम करने में दिक्कत होती है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि नॉर्मल IQ होने के बावजूद ये शिक्षण  में उतना अच्छा कार्य   नहीं कर पाते, जितना अच्छा करने की क्षमता  इनके अंदर होती है।
अगर इस तरह के लक्षण आप बच्चे में देखते हैं तो इनके समाधान के लिए आप अपने नजदीकी पेडियाट्रिशियनशिशु रोग विशेषज्ञ  या मनोरोग चिकित्सक  से जरूर मिलें। इसका इलाज संभव है और बिहेवियर थेरपी के साथ-साथ कुछ एक्सपर्ट आपको कुछ जरूरी मेडिसिन्स भी बच्चे के लिए दे सकते हैं।
बच्चे से जुड़ी इस समस्या को पहचानने में पैरंट्स के साथ ही स्कूल टीचर्स का बहुत बड़ा योगदान हो सकता है। बच्चे को लेकर शिक्षकों  का फीडबैक बहुत महत्वपूर्ण  होता है। ताकि उसकी क्रियाकलापों   को सही तरीके से समझकर, उसे बेहतर तरीके से चिकित्सा  किया जा सके।
यह रोग भविष्य में बहुत दुखद परिणति लाकर खड़ा देता हैं .शिशु ,परिवार और अपने भविष्य के प्रति एक प्रकार से जिम्मेदारी बन जाता हैं .


डॉ अरविन्द प्रेमचंद जैन, भोपाल मोबाइल 09425006753

 





















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