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महाराजा अग्रसेन का उपकारहीन उपक्रम: एक निष्क और एक ईंट (लेख)







 *डॉ. साधना गुप्ता*


महाराज अग्रसेन का जन्म इक्ष्वाकु वंश (सूर्यकुल) में प्रतापपुर के महाराज श्री वल्लसेन की रानी भगवती के गर्भ से अश्विन मास, शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि, रविवार को मध्याह काल में विक्रम संवत् से 3065 वर्ष  6 माह पूर्व (लगभग 5143 वर्ष पूर्व द्वापर युग में) हुआ। कुण्डली गणना से शस्त्रों-शास्त्रों से भी आगे जाने वाले भाग्यशाली के रूप में जानकर नाम रखा गया अग्रसेन। कुशाग्र बुद्धि बालक अग्रसेन महर्षि ताण्ड्य से वेद शास्त्रों, संहार विधि सहित संपूर्ण अस्त्र-शस्त्रों के रहस्यमय ज्ञान में पारंगत हुए।


महाभारत के युद्ध में पाण्डवों की ओर से लड़ते हुए दसवें दिन भीष्म पितामह के बाणों से घायल पिता वल्लभ सेन के वीरगति प्राप्त करने पर कुमार अग्रसेन ने 14 वर्ष की अल्पावस्था में युद्ध में भाग लेते हुए अपने पराक्रम से रणभूमि में भयंकर रूप उपस्थित कर सभी को चमत्कृत किया और अन्तिम दिन तक युद्ध किया।


प्रतापपुर लौटने पर राजपरिवार द्वार उन्हें पिता का उत्तराधिकारी बनाया गया जिससे असन्तुष्ट चाचा कुन्दनसेन एवं उनके पुत्र ब्रजसेन द्वारा अग्रसेन को सोते हुए धोखे से बन्दी बना लिया जाता है परन्तु अपने दादा वृहत्सेन के प्रिय मित्र व सहपाठी जो उस समय कारागार आमात्य के पद पर थे, के प्रयास से गुप्त सुरंग के रास्ते बाहर निकाल दिए जाते हैं। जहाँ से अग्रसेन बालुका वन में महर्षि गर्ग से मार्गदर्शन प्राप्त कर आश्रम की मिट्टी से भगवान विष्णु प्रिया महालक्ष्मी की प्रतिमा निर्मित कर और मत्रोक्त विधि से स्थापित कर, अश्विन मास के शुक्ल, पक्ष की दशमी तिथि (विजयदशमी) से ग्यारह सौ दिवस तक कठोर तप करते हुए - एकाग्र चित्त एक पांव पर खड़े रहकर लक्ष्मी का हृदय में ध्यान करते हुए अहंकार शून्य, मौन व्रत, समाधि स्तुति व ध्यान में लीन रहे तब जगत जननी महालक्ष्मी ने प्रसन्न हो - पदमासना रूप में पीताम्बर धारण किए, शंख - चक्र - गदा संयुक्त साक्षात् दर्शन देकर ''वर मांगने को कहा''। अग्रसेन प्रथम वर के रूप में अपने हृदय में महालक्ष्मीजी में ध्यान तथा लक्ष्मी को स्मरण करने वाले का लक्ष्मी द्वारा कभी त्याग न करना मांगते है। दूसरे वर के रूप में हमेशा के लिए लोभ - मोह - क्रोध पर विजय, मन व चित्त में सत्य व तप की विद्यमानता को प्राप्त करते हैं।


वर प्राप्त कर लौटे अग्रसेन का मार्गदर्शन करते हुए महर्षि गर्ग आश्रम भूमि में दबे धन को प्राप्त कर नवीन राज्य की स्थापना करने का आह्वान करते हैं, उनका राज्यभिषेक करते हैं। वस्तुतः यह धन वह है जो अग्रसेन के पूर्वज महाराज मरूत द्वारा सौ यज्ञ पूर्ण कर दक्षिणा स्वरूप बाह्मणों को दिया गया था परन्तु अत्याधिक होने के कारण ब्राह्मण उसे साथ नहीं ले जा सके, परित्याग कर गए। परित्याग की गई वस्तु पर अब उनका कोई अधिकार नहीं है। अतः 21 वर्ष की अल्पावस्था में अग्रसेन आश्रम के समीप पश्चिम दिशा में बालू व वन से परिपूर्ण उस भूमि पर एक सुन्दर पुरी का निर्माण करते हैं जो 'आग्रेय' नाम से प्रसिद्ध हुई। इसे आज हम अग्रोहा नाम से जानते है। बारह योजन (96 मील) लम्बी एवं 4 योजन (32 मील) चौड़ी आयताकार इस पुरी का निर्माण शिल्प शास्त्र के नियमों के आधार पर करवा कर अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी को आग्रेय पुरी के परम आसन पर प्रतिष्ठित किया और राजपुरोहित पद पर महर्षि गर्ग को फिर देश देशान्तर से चारों वर्णों के श्रेष्ठ लोगों - वेदों के तत्वज्ञ, सम्पूर्ण शास्त्रों में पारंगत, धर्मज्ञ, कर्मकाण्ड में निपूर्ण एवं पवित्र आचरण वाले ब्राह्मण, धन-दौलत से सम्पन्न, रत्न पारखी, गोधन, गजधन से युक्त कुशल व्यवसायी वेश्य, युद्ध कला में निपूर्ण धर्म पालक क्षत्रिय, सेवा को स्वधर्म मानने वाले शूद्र वर्ण व्यक्ति, सभी को यथायोग्य स्थान देकर बसाया।(1)


पुनः गर्ग के निर्देशानुसार गृहस्थ धर्म पालनार्थ नागलोक में नागराज महीधर की पुरी मणिपुर जाकर महीधर की कन्या राजकुमारी माधवी से विवाह करते हैं। (नागलोक के सात लोक तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल (महातल), रसातल और पाताल वर्तमान भारत वर्ष के पूर्वांचल स्थित पर्वतीय प्रदेश-असम, मेघालय, मनिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम, नागालैण्ड, अरूणाचल प्रदेश हैं। वर्तमान समय में टूरिस्ट इंडिया रोड एटलस में इन सातों प्रदेशों को सात बहनों के नाम से दर्शाया गया है - अग्रभागवत कथा पृ. 34)। नागराज महीधर इस अवसर पर अपने सात लोकों में से उत्तम 'तल लोक' अग्रसेन को अर्पित कर 'अग्रतल' नाम से सम्बोधित करते हैं जो वर्तमान में पूर्वांचल में त्रिपुरा की राजधानी 'अगरतला' है।


माधवी से विवाह होने से देवराज इन्द्र कुपित हो आग्रेयपुरी में वर्षा बन्द कर देते हैं तब प्रजा रक्षार्थ अग्रसेन संचित अन्न के भण्डार जनता के लिए खोल देते हैं साथ ही माधवी की सलाह पर भाग्याश्रित न रह कमाश्रित हो पुरूषार्थ को महत्व देते हुए, नदियों के जल को सिद्ध कर, नहरों का निर्माण कर, आग्रेयपुरी तक जल लाकर प्यासी धरा को पुनः प्रफुल्लित करते हैं। इन्द्र प्रेरणा से अग्निदेव द्वारा लहलहाती फसल जलवा देने पर पुनः एकाग्रचित्त हो महालक्ष्मी की प्रार्थना कर, साक्षात् उपस्थित महालक्ष्मी से इन्द्र से अभय का वरदान प्राप्त कर, इन्द्र से भयंकर युद्ध करते हैं जिसमें गुरू वृहस्पति द्वारा संधि करवाने पर इन्द्र अग्रसेन के शील और सौन्दर्य की परीक्षा लेने को युद्ध का कारण बदला, अग्रसेन से चिरकाल तक मैत्री की इच्छा प्रकट करते हैं।


माधवी से अग्रसेन को अट्ठारह पुत्र और एक पुत्री प्राप्त होते हैं। पुत्रों के विवाह नागराज वासुकी की पुत्रियों क्रमशः विभुसेन से चित्रा, विक्रमसेन से शुभा, अजयसेन से शीला, विजयसेन से कांति, अनलसेन से स्वाति, नीरजसेन से रेणुका, अमरसेन से क्षमा, नगेन्द्रसेन से शिरा, सुरेशसेन से सखी, श्रीमंतसेन से श्री माला, सोमसेन से शान्ति, धरणीधरसेन से प्रिया, अतुलसेन से सुकन्या, अशोकसेन से सावित्री, सुदर्शनसेन से हेमवती, सिद्धार्थसेन से तारा, गणेवश्वरसेन से नागमणि, लोकपतिसेन से प्रभावती से हुआ। पुत्री ईश्वरी का विवाह परम धार्मिक काशीराज के पुत्र राजा महेश के संग हुआ जो बाद में मोक्ष धर्म में स्थापित होकर ब्रह्मस्वरूप महामुनि के रूप मेें प्रसिद्ध हुए। वासुकी ने दहेज में अपनी समस्त सम्पत्ति और विदिशा राज्य देना चाहा, तब अग्रसेन ने यह कह कर रोक दिया - ''मैं ब्राह्मण नहीं हूँ। मैं तो राजा हूँ और राजा का धर्म पोषण करना होता है, शोषण नहीं। मैं दूसरे का धन ग्रहण करके उसके वैभव को समाप्त नहीं कर सकता।



क्षत्रिय वर्ण से वैश्य वर्ण अपनाना - जब अग्रसेन का वंश पुत्र पौत्रादि के रूप में शाताधिक हो गया तब महर्षि गर्ग ने अग्रसेन को इक्ष्वांकु, रघु इत्यादि के समान अपनी संतति को गोत्र कृत करने, वंश विकास हेतु 'वंशकर' नामक यज्ञ करने के लिए प्रेरित किया अतः चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को अग्रसेन ने यज्ञ की दीक्षा ग्रहण की पुत्रों की संख्या के अनुरूप अट्ठारह यज्ञों का संकल्प किया। यज्ञ के आचार्य पद पर कुल पुरोहित महर्षि गर्ग तथा ब्रह्मा पद पर महर्षि वेदव्यास अभिषिक्त किए, शेष महर्षि ऋत्विक बनाए। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में गुरूवार, अश्लेषा नक्षत्र में महर्षि गर्ग ने विधिविधान से मंत्रोच्चार के साथ अग्नि को यज्ञाग्नि प्रदान की। सत्रह दिनों में सत्रह यज्ञ पूर्ण हुए।


परन्तु यज्ञ में प्रतिदिन होने वाले रक्त स्नात मांस युक्त बलिकर्म से अग्रसेन का मन ग्लानि से पूर्ण हो गया, निस्तेज हो वे विचलित मन से अपने भवन की ओर लौट गए। बलि पशुओं की दयनीय दशा से विचार मग्न सोचने लगे - पशुबलि के कारण यह यज्ञ धर्म के अनुकूल नहीं है, हिंसा कर्म धर्म नहीं कहला सकता। अतः यज्ञ कर्म न करने का निश्चय करते हैं। ऋषियों द्वारा पशुबलि को शास्त्रों में स्वीकृत बताने पर कहते हैं - ''प्राणदान से बढ़कर कोई दूसरा दान नहीं है। वृक्षों को काटने वाले, पशुओं की हत्या करने वाले तथा रक्तिम कर्म करने वाले ही यदि स्वर्ग जाएंगे तो फिर नर्क में कौन जाएगा ? मिथ्या भाषण, परस्त्रीगमन, बिना शत्रुता किसी पर क्रूरता सबसे बड़ा दोष है। स्वयं के सुख के लिए किसी प्राणी के वध की अनुमति भला मैं कैसे दूँ ? यदि यह सब क्षत्रिय के लिए दोषमुक्त है तो मैं अपनी प्रजा रक्षार्थ, उसके विनाश को रोकने के लिए क्षत्रिय धर्म का परित्याग करता हूँ। मैं सत्य की शपथ लेकर घोषणा करता हूँ कि आज और अभी से मैं वैश्य धर्म की अनुपालना करूँगा, मेरा कुल भी आज वे वैश्य हो जावे। वैश्यों का कर्म कृषि, गोपालन एवं व्यापार, कृषि से अन्न, गोपालन से दुग्ध तथा व्यापार से सम्पूर्ण लौकिक आवश्यकताओं की पूर्ति द्वारा प्रजापालन ही दया प्रधान धर्म है।'' इन तर्को से ऋषियों को संतुष्ट कर वैश्य धर्मानुसार शास्त्रोक्त विधान से, दूध-दही-पुष्प से यज्ञ को पूर्ण किया। इस प्रकार सत्रह यज्ञ क्षत्रिय वर्ण व्यवस्थानुसार अट्ठारवाँ यज्ञ वैश्य वर्ण व्यवस्थानुसार पूर्ण कर वैश्य कहलाए। अतः तथ्यानुपलब्धि के अभाव में अट्ठारवें यज्ञ के अधूरा रहने व अग्रकुल के साड़े सत्रह गोत्र की प्रचलित धारणा दोषपूर्ण है। गोत्र नामकरण का आधार क्या है? राजकुमारों का नाम तो निश्चय ही नहीं। तब यज्ञों के आचार्यो के नाम या पहचान तथा किस राजकुमार के नाम से कौनसा गोत्र निर्धारित हुआ, इसका स्पष्ट विवरण हमें उपलब्ध नहीं हुआ। इतना अवश्य ज्ञात हुआ कि इनके वंशजों ने सात पीढ़ी तक नाग कन्याओं से विवाह किए, तदन्तर अपना गोत्र टालकर अपने ही वंश में विवाह की प्रथा बनाई। क्योंकि सात पीढ़ी बाद वंश में कोई परस्पर भाई-बहिन नहीं रहते।


उपकार हीन उपक्रम: 'एक निष्क और एक ईंट' - कारागार निरीक्षण के वक्त अपने बाल सखा ब्राह्मण कुमार 'शाकुन्त' को बंदी देख पापकर्म का कारण पूछने पर दरिद्रता एवं भूख को अकर्म के लिए प्रेरित करने वाला बताने पर अग्रसेन चिन्तन करते हुए, प्रजा की दरिद्रता के कारण स्वयं को अपराध में सहभागी मानते हैं। और तब योग्य व विद्वान होने पर भी भाग्यवश आजीविका विहिन होने, पर याचना न करने वाले स्वाभिमानी का सहयोग करने की सर्वोत्थान भावना से - यह उपकार हीन उपक्रम स्थापित कर बन्धुता की भावना के संग व्यक्ति - समाज - राष्ट्र तथा मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते है। विभुसेन के जिज्ञासा को शान्त करते हुए कहा - ''आज से इस आग्रेय राष्ट्र में जो भी व्यक्ति भाग्य वश आजीविका से विहिन हो जावे, उसे बिना याचना किए ही, राज्य के सभी निवासी ''एक निष्क और एक ईंट'' स्वयं उसके पास जाकर उसे भेंट स्वरूप प्रदान करें।'' (द्वापर के अन्तिम चरण में विनिमय के लिए प्रयुक्त धातु अंश निष्क (वर्तमान का एक रूपया) कहा जाता था) क्योंकि भेंट दी गई वस्तु में उपकार की भावना नहीं होती है जिससे भेंट स्वीकार करने वाले के स्वाभिमान को ठेस भी नहीं पहुँचती हैं।


युग संक्रमण की उस बेला में मानव प्रकृति में गुणों की विपरीतता को लक्ष्य कर गर्ग द्वारा प्रेरित आपने पृथ्वी की प्रदक्षिणा करते हुए धर्म व शान्ति स्थापना हेतु ''जीवन धर्म'' का उपदेश दिया। तत्पश्चात् 108 वर्ष की आयु पूर्ण कर लोकतान्त्रिक विधान से, सर्वसम्मति से पुत्र विभुसेन को राज्यभिषिक्त कर सफलता के सूत्र बताए - ''बुद्धिमान पुरूष न किसी पर क्रोध करे, ना किसी का अनादर। सभी प्राणियों के प्रति दया व मैत्रीपूर्ण व्यवहार, दान तथा सबसे मधुर वाणी का प्रयोग करे तो इसके समान कोई वशीकरण मंत्र नहीं। ऐसा नहीं है कि बुद्धि से ही धन एवं वैभव प्राप्त होता है और न ही दरिद्रता का कारण मूर्खता होती है। यह सब भाग्याधीन है परन्तु सत्य, धर्म, मनोनिग्रह पवित्रता, दया, मधुर वाणी और मित्र से द्रोह न करना - ये सात बातें लक्ष्मी को बढ़ाने वाली है।''


सपत्नी मार्गशीर्ष पूर्णिमा को वानप्रस्थ को गए। वर्षो एक पैर पर खड़े हो महालक्ष्मी के तप का सैकड़ों मंत्रो से अनुष्ठान किया। और महालक्ष्मी से अपने वंश के अभ्युदय हेतु सूर्य-चन्द्र की उपस्थिति पर्यन्त महालक्ष्मी के अग्र वंश में पूजित होने, अग्र वंश का परित्याग न करने का आशीष प्राप्त किया।


अन्त में सशरीर स्वर्ग के प्रस्ताव को अस्वीकार कर शुद्ध ज्ञान योग में तत्पर हो परम वैराग्य का बल प्राप्त कर सनातन मोक्ष पद को प्राप्त किया।


नोट - शोध आलेख का आधार 'जय भारत' (महर्षि जैमिनी) का भविष्य पर्व का अग्रसेन उपाख्यान है।


*डॉ. साधना गुप्ता, 'सह आचार्य' ,मंगलपुरा टेक,झालावाड़ (राज.) मो. 9530350325








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