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संजा लोकोत्सव के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन दिवस पर हुआ शोध पत्रों का वाचन 

लोकगीतों में गहरी मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति होती है - डॉ सहगल 



उज्जैन। प्रतिकल्पा द्वारा आयोजित संजा लोकोत्सव के अंतर्गत 15 सितम्बर को अंतरराष्ट्रीय अन्तरनुशासनिक संगोष्ठी का समापन हुआ। लोक और जनजातीय साहित्य एवं संस्कृति : सरोकार और संवेदनाएँ और हिंदी  विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी का समापन लोक संस्कृतिविद डॉ पूरन सहगल, मनासा के मुख्य आतिथ्य में हुआ। अध्यक्षता रोमा सांस्कृतिक विश्वविद्यालय, बेलग्रेड, सर्बिया के चांसलर पद्मश्री डॉ श्यामसिंह शशि ने की। विशिष्ट अतिथि लोक संगीतकार श्री विनोद कुमार मिश्रा सुरमणि, दतिया थे। मुख्य समन्वयक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने संगोष्ठी की संकल्पना और उपलब्धि पर प्रकाश डाला। 


डॉ पूरन सहगल ने अपने उद्बोधन में कहा कि लोक साहित्य कुंठामुक्त साहित्य है। लोकगीतों में गहरी मानवीय संवेदनाओं के दर्शन होते हैं। जनजातीय समुदायों में पारस्परिक प्रेम और समानता आज भी जीवित है। प्रकृति के साथ रहकर उन्होंने जो ग्रहण किया है, उसे वे आज भी आत्मसात किए हुए हैं।  


अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री डॉ श्यामसिंह शशि ने कहा कि लोक और जनजातीय साहित्य में विविध भावों की अभिव्यक्ति हुई है। लोक से निकलने वाले स्वर की कोई तुलना नहीं की जा सकती है। लोक परंपराओं को जीवित रखने के लिए व्यापक प्रयासों की जरूरत है। भावी पीढ़ियों को लोक की समृद्ध परंपराओं से जोड़े रखने की जिम्मेदारी पूरे समाज की है। 


श्री विनोद मिश्रा सुरमणि ने कहा कि लोक संगीत में लोकमानस की अभिव्यक्ति होती है। लोकगीत सैकड़ों वर्षों से अत्यंत सरसता के साथ हमारे संस्कार और संस्कृति को जीवंत करते आ रहे हैं। 


प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि लोक और जनजातीय साहित्य और संस्कृति जीवन की अक्षय निधि के स्रोत हैं। यह धारा कभी सूखती नहीं है। लोक साहित्य निरन्तर बहता हुआ वर्तमान है। विविध लोकाभिव्यक्तियाँ जीवन की एकरसता को तोड़ती हैं। विकास के नए प्रतिमान एक जैसेपन को बढ़ाते हैं, इसके विपरीत लोक-साहित्य और संस्कृति एक जैसेपन और एकरसता के विरुद्ध हैं। मनुष्य की सजर्नात्मक सम्भावनाओं का प्रतिबिम्बन लोक और जनजातीय कला - माध्यमों में सदियों से होता आ रहा है। उन्हें लेकर नितनूतन दृष्टि से शोध की आवश्यकता है। 


डॉ जगदीश चंद्र शर्मा ने कहा कि ब्रज क्षेत्र में सांझी को जीवित देव माना जाता है। पुष्टिमार्गीय और परवर्ती साहित्य में पारंपरिक सांझी कला का वर्णन मिलता है। 
समापन के पूर्व तीन तकनीकी सत्रों में डॉ वेदप्रकाश दुबे, मुम्बई, श्री ललित शर्मा, रायपुर, डॉ शिशिर उपाध्याय, बड़वाह,  श्री अनूप तिवारी, छत्तीसगढ़, डॉ शिव चौरसिया, डॉ डी डी बेदिया आदि ने व्याख्यान दिए। लोक और जनजातीय साहित्य एवं संस्कृति और हिंदी : सरोकार और संवेदनाएँ पर केंद्रित इस संगोष्ठी में  दस से अधिक राज्यों के अध्येताओं ने भाग लिया।


समापन समारोह में दस श्रेष्ठ शोधपत्र प्रस्तुतकर्ताओं को अतिथियों ने पुरस्कृत किया। अतिथि स्वागत संस्था के अध्यक्ष श्री गुलाब सिंह यादव, मुख्य समन्वयक प्रो. शैलेन्द्रकुमार शर्मा, मानसेवी निदेशक प्रतिकल्पा डॉ. पल्लवी किशन एवं सचिव कुमार किशन ने किया।


संचालन राम सौराष्ट्रीय ने किया और आभार प्रदर्शन श्री गुलाब सिंह यादव ने किया। 


तकनीकी सत्रों का संचालन डॉ अजय शर्मा और श्री रामसिंह सौराष्ट्रीय ने किया।


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