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रिश्तों की गरिमा क्यों खो रही है(लेख)


रिश्ते  या सम्बन्ध भारतीय जीवन के केंद्र में रहे हैं और लोग उन्ही को जीने में अपना जीवन मानते रहे हैं। रिश्तों का बंधन बड़ा सुहावना लगता है और हमारा इतिहास , संस्कृति और संस्कार इस बात के गवाह हैं कि हम रिश्तों के ख़ातिर सब कुछ दांव पर लगा देते थे।


एक जमाना था जब धर्म के बने भाई- बहन जीवन भर रिश्तों को निभाते थे। किसी को भाई कह देने भर से लड़की अपने आपको सुरक्षित महसूस करती थी। लोग भी बहु - बेटियों की इज्जत करना अपना धर्म समझते थे। एक की बेटी सारे गांव की बेटी होती थी। लेकिन आज सारे रिश्ते पानी के बुलबुले जैसे हो गए हैं। हों भी क्यों नहीं, जब एक बाप अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखने की अपेक्षा उसे अपनी हवस का शिकार बना लें। एक भाई के हाथों बेटी- बहन की इज्जत लूट ली जाए।


भारतीय समाज आज एक चुनौती भरे बदलाव के दौर से गुजर रहा है। व्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे बढ़ रहे हैं, और समाज की "चिंता" सिकुड़ती जा रही है। पिछले दिनों भारत मे बहन - बेटियों के साथ हुई घटनाएं झकझोर कर रख देने वाली है। हर घटना में " पब्लिसिटी" की मानसिकता के चलते बन्द,  आंदोलन तो होते हैं ,पर परिणाम?? वही शून्य !! फिर कहीं न कहीं दुष्कर्म की घटनाओं की पुनरावृत्ति ! इन जघन्य अपराधों की सज़ा या निर्णय करने में भी अदालतों को वर्षों लग जाते हैं।


दोषियों को ऐसी सज़ा मिलनी चाहिए कि दूसरी बार अपराध करने की किसी की हिम्मत ही न हो। ऐसी  स्थिति में आखिर एक बेटी, एक औरत किस पर विश्वास करे ? क्या कर्तव्य, संवेदना, भावना, स्नेह जैसे शब्द किताबो तक नही सीमित रह गए हैं ? क्या रिश्तों की गरिमा कहीं खो गई हैं??


नारी की कोख से जन्म लेकर पुरुष प्रायः  उसके प्रति निष्ठावान नहीं रहते है।कहते हैं कि आदमी से ज्यादा बुद्धिमान औऱ खूंख्वार प्राणी इस धरती पर कोई नहीं है ; तभी तो खतरनाक जानवर भी उसके सामने दुम हिलाते हैं और उसके इशारे पर नाचते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब आदमी के अंदर जानवर की प्रवृत्ति पनपने लगती है और वह सामाजिक मर्यादाओं, रिश्तों की गरिमा, संवेदनशीलता, मूल्यों, आदर्शों आदि सबको ताक पर रख देता है। बाप,भाई ,शिक्षक, देवर, जेठ आदि प्रायः सभी रिश्ते कलंकित होते दिखाई देने लगे हैं।


समाज की नींव हिलाने वाले ऐसे हादसों  से जीवन में कटुता और असुरक्षा की भावना ही आती है क्योंकि इसके बाद हर एक को सन्देह की नज़र से देखा जाने लगता है। आज हम नारी उत्थान की बातें करते हैं। निर्णय लेने वाली हर संस्था और कानून बनाने वाली संसद में उसे आरक्षण दिलाने को संघर्ष भी करते हैं और दूसरी तरफ उसके प्रति बढ़ रहे अपराध महिला के मन मे भय व दशहत पैदा कर रहे हैं।


बौद्धिक दृष्टि से सक्रिय और भावनात्मक रूप से उथलपुथल से गुजरते हुए बेटीयाँ आज एक जटिल माहौल में जी रही है। मीडिया और सूचना क्रांति उनके सामने फैशन, रोजगार, सेक्स और मनोरंजन के नित नये रूप परोस रहे हैं तो पुरुष वर्ग भी साइबर दुनिया के अश्लील, विकृत मकड़जाल में उलझ कर एक ऐसी घिनौनी मानसिकता के शिकार होते जा रहे हैं जिनके परिणाम स्वरूप ऐसी घटनाएं आम होती जा रही है।


कुछ विद्वान मानते हैं बलात्कार या उसके बाद महिला या  अबोध बच्ची की हत्या के मामले में अपराधी प्रायः छूट जाता है और अगर चिन्हित कर भी लिया जाता है तो भ्रष्टाचार की मार से गवाह कमजोर किये जाने लगते हैं फिर  अदालत के झूठ - सच की खिचड़ी तथा वकिलों की आपसी सांठ - गांठ न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर जाती है। पिछले कुछ समय से महिलाओं ने अपने प्रति हो रही हिंसा, बलात्कार की घटनाओं के विरुद्ध बोलना शुरू किया है। यह अच्छा सा संकेत है।दूसरा पहलू यह भी है कि कहीं कहीं महिलाएं भी इस प्रकार की घटनाओं के लिए स्वयम जिम्मेवार बन जाती है जो स्वतंत्रता को स्वछंदता समझने की भूल कर रही होती है। ऐसी घटनाओं को राजनीतिक रंग दिए जाने से भी बचना होगा।


महिलाओं की सुरक्षा के लिए ढेर सारे कानून हैं फिर भी उनके प्रति बढ़ रहे अपराधों का सिलसिला खत्म नही होता। न्यायपालिका को नज़रिया बदलना चाहिए ।सरकार को कानून में संशोधन कर  इन्हें सख्त बनाना चाहिए। बलात्कार के मामले में त्वरित सुनवाई हो और एक ही दंड हो - मृत्यु दंड । तब जाकर अपराधियों के मन में कानून का ख़ौफ पैदा होगा। महिलाओ को अपनी सुरक्षा और स्वाभिमान के लिए सामूहिक रूप से पूरजोर आवाज़ उठानी चाहिए। केवल नारेबाजी, जुलूस, मोमबत्ती जलाने से इस देश में कुछ होने वाला नही है।


*राजकुमार जैन राजन, चित्रा प्रकाशन, आकोला- 312205 ,(चित्तौड़गढ़) , राजस्थान, मोबाइल : 9828219919, ई मेल :  rajkumarjainrajan@gmail.com


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