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बहुत याद आते हो "मांगा जीजी" (संस्मरण) 







-कारुलाल जमडा़

 

श्राद्धपक्ष प्रारंभ होते ही मन अतीत की उन सुमधुर अनमोल स्मृतियो में खो जाता है जब मालवा में घर-घर "संजा"बनायी जाती थी!मुझे भी "संजा" के सारे गीत याद थे और अभी तक है !शाम होते ही बच्चों की टोलियाँ घर-घर "संजा" बनाने निकल जाती! फिर आरती होती और एक दूसरे के घर जाकर आरती गाते, प्रसाद बंटती और फिर "कलाकोट" भी!सबसे पहले आरती होती पीपल वृक्ष  के पास रहने वाले विद्या जीजी, शकुंतला जीजी और सीमा जीजी के यहाँ! फिर बबली जीजी, लाली जीजी और कक्कू जीजी तीनो बहनों के घर ,फिर मेरे पास के  चैनू जीजा,गुडलेस और आखरी में  "मांगा" जीजी !मांगा जीजी "संजा" के "बरबोलिये"(होली पर गोबर से बनाई जाने वाली एक आकृति) बनाने में निपूण थी! जब भी "संजा" के सृजन में कोई विशिष्ट शिल्प रचना होता तो, मांगा जीजी सबकी प्रिय "संजा" सर्जिका थी!मैं भी अपने घर "संजा" बनवाने में छोटी बहनों की मदद करता था! वास्तव में मुझे भी जुनून की हद तक "संजा" के श्रृंगार में मजा आता! सफेद फूल पत्तियाँ ,चमक चिपकाने का काम मेरे जिम्मे था! एक दिन तीनों बहने जैसे ही "संजा" बनाने के बाद अपनी सहेलियों के पास गई, मैने अपना काम शुरु किया! पर एक-दो जगह आकृति में कम गोबर होने से मैने अपनी डेढ़ अकल लगाना शुरु की! जहाँ ज्यादा मोटा गोबर था, वहाँ से निकालकर दूसरी तरफ पतली आकृति को मोटा करने लगा! पर संवारने की बजाय गोबर बार-बार नीचे गिर जाता! इस तरह पूरी "संजा" का नक्शा ही बिगड़ गया! अब आरती की घड़ी नजदीक आ गई थी! धीरे-धीरे लड़कियों के संजा गीतों की स्वरलहरियाँ बढ़ती जा रही थी! कुछ देर में हमारे घर आरती होना थी! मैं हैरान-परेशान था! तभी गुड्डी  यानी पहले नंबर की बहन घर आ गयी! उसने देखते ही जो़र-जो़र से रोना शुरु कर दिया!धीरे-धीरे खबर मोहल्ले में फैल रही थी कि "कारु ने कलाकारी" की!फिर मझली बहन किरण  को पता चला!अब दोनों बहनों ने रोना शुरू कर दिया! मैं भागता हुआ पहले गोबर का इंतजाम करने गया पर अब आस-पास के ठानों में गोबर ख़त्म हो गया था!अंततः मैं हमारी  संकटमोचक मांगा जीजी के पास पहुँचा और अपनी समस्या बतायी! उन्होने कहा कि तू गोबर लेकर आ, मैं पन्द्रह मिनट में "संजा" तैयार कर दूंगी! पर जब मैने बताया कि गोबर नहीं मिल रहा, तब वे मुझे गोबर दिलाने निकल गई! अब दूसरे मोहल्ले  में आगे-आगे मांगा जीजी और पीछे तगारी लेकर मैं! एक के बाद दूसरा घर! मेरी धड़कन बढ़ रही थी! दस-पन्द्रह मिनट में लड़कियों की टोली घर पहुँचने वाली थी! उधर दोनों बहनो का रो-रोकर बुरा हाल था! आखिर में एक घर पर गोबर मिल गया! मांगा जीजी और मैं भागते -2 घर पहुँचे!तब तक सब जगह खबर पहुँच गई थी कि कारु ने "संजा" बिगाड़ दी और अब मांगा जीजी नयी बना रहे हैं! इसके पहले कि टोली घर तक पहुँचती, "संजा"बनकर तैयार हो गई थी! वह भी सबसे खूबसूरत और अलहदा! अब खुशी के मारे मैं  मांगा जीजी  के सामने फूट-फूट कर रोने लगा! मेरे घर के बाद आरती का नंबर उन्हीं के यहाँ था! वह "संजा" बनातीे हुई घर आयी थी! अभी उनकी "संजा" का श्रृंगार शेष था! वह समझ गई थी कि अब मैं तत्काल सामान्य नहीं हो पाऊंगा! वह मुझे अपनी "संजा" सजाने के लिए ले गयी! वहाँ हमने पांच -सात मिनट में संजा तैयार कर दी! उस दिन मैने "संजा गीत"  वहीं पर गाये!बच्चों के सामने मैं अब सामान्य था पर गला रुँधा हुआ था! मांगा जीजी हम सब सहेली-सहेलियों में बडी़ थी और  मेरी उमर रही होगी करीब तेरह साल! संजा उत्सव के समय हर साल मुझे ये संस्मरण बहुत झकझोरते हैं! बहुत याद आते हो मांगा जीजी।






 



 



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